रामगंगा के जलस्तर में बृहस्पतिवार से वृद्धि जारी है। पानी बढ़ने के बाद भी नदी गांव छोटे पहरूआ, बड़े पहरूआ, हरिहरपुर व कुनिया शाहनजीरपुर में भू-कटाव कर रही है। शुक्रवार को नदी के किनारे पर आ गए गांव कुनिया शाहनजीरपुर के ग्रामीण अपने आशियाने तोड़ रहे हैं। भू-कटाव की गति को देखते हुए छोटे पहरूआ गांव का अस्तित्व खतरे में है।
रामगंगा के तटवर्ती गांव कुनिया में नदी की जद में आ गए रमेश सिंह, आर्येंद्र सिंह, हरिप्रवेश, वीरपाल सिंह, रामभान सिंह आदि अपने आशियाने खुद तोड़ रहे हैं। नदी सर्वाधिक भू-कटाव कुनिया और पहरूआ गांव के बीच में करते हुए लहलहाती फसलों के साथ कृषि योग्य भूमि निगलती हुई आबादी की ओर बढ़ रही है। इस बाढ़ में छोटे पहरूआ गांव का अस्तित्व खतरे में है। इस गांव में पक्के मकान बनाकर रह रहे लोग पहली बाढ़ में ही अपने मकान तोड़कर ईंट और लकड़ी निकाल ले गए हैं। झोपड़ों मे रहने वाले अब गांव खाली कर रहे हैं।
ग्राम छोटे पहरूआ के ओमकार, अवनीश, जालिम, रिषीपाल तथा कुनिया के रमेश सिंह, ध्रुवपाल सिंह, आर्येन्द्र आदि का कहना है कि राजस्वकर्मी बाढ से हो रहे नुकसान को देखने तो आ रहे हैं,किंतु बरबाद हो रहे लोगों की किसी तरह की मदद नहीं कर रहे हैं। पीड़ितों का कहना है कि राजस्व विभाग उन्हें अन्यत्र बसने के लिए जगह ही मुहैया करवा दे,तो वे इसी टूटे हुए मकानो के मलबे से सिर छिपाने की जुगाड़ कर लेगें।
उधर बड़े पहरूआ गांव में पीपल का पुराना पेड़ शिव मंदिर को नदी में समाने से बचाये हुए है। पीपल की जड़ों से नदी के टकराने से यहां भू-कटाव रूका हुआ है। पहरूआ गांव के रिटायर्ड शिक्षक सुरेशचंद्र शर्मा,प्रदीप कुमार,विनोद कुमार,इंद्रपाल सिंह,ओमपाल शर्मा आदि का कहना है कि गांव के लोगों ने बाढ से बचावे के लिए सभी प्रयास किए, किंतु विकास की दुहाई देने वाले जनप्रतिनिधियों ने उनकी एक नहीं सुनी। बता दें कि ग्राम बड़े पहरूआ,छोटे पहरूआ, हरिहरपुर के ग्रामीणों ने पिछले लोक सभा चुनाव का बहिष्कार किया था।