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Shahjahanpur News: आरएएफ के घेरे में आज निकलेगी बड़े लाट साहब की सवारी

Fri, 14 Mar 2025 12:08 AM IST
बरेली ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहाँपुर
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शाहजहांपुर में लाट साहब के जुलूस से पहले रिहर्सल के दौरान शामिल आरएएफ के जवान। स्रोत: वीडियो ग्
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शाहजहांपुर। देशभर में चर्चित लाट साहब का जुलूस होली पर शुक्रवार को आरएएफ और पीएसी के घेरे में निकाला जाएगा। इसकी वीडियोग्राफी भी की जाएगी। ड्रोन कैमरे से भी निगाह रखी जाएगी। जुलूस के मार्ग पर वाहनों को प्रतिबंध किया गया है।
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शुक्रवार को सुबह कूंचा लाला से निकलकर बड़े लाट साहब चौकसीनाथ मंदिर में दर्शन करने के बाद भैंसागाड़ी पर सवार होंगे। इसके बाद उनकी सवारी चौक कोतवाली के अंदर जाएगी। यहां कोतवाल सलामी देने के बाद उन्हें भेंट देंगे।
यहां से जुलूस सराफा बाजार, चारखंभा, केरूगंज, मिशन स्कूल, जेल से जीआईसी होते हुए विश्वनाथ मंदिर के पास पहुंचेगा। यहां बाहर से ही पूजन करने के बाद दोबारा से जुलूस शुरू होगा। जिसके बाद शहीद पार्क के सामने से एसपी कॉलेज, पंखी चौराहा, बहादुरगंज पंचराहा, सदर बाजार थाना, कालीचरन रोड, बंगश से कूंचा लाला में समाप्त होगा। बड़े लाट साहब की सुरक्षा को मुख्य तौर पर आरएएफ संभालेगी। रस्सी के घेरे में लाट साहब चलेंगे। इसके अंदर सिर्फ कमेटी के प्रमुख पदाधिकारी ही जा सकेंगे।
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सरायकाइयां क्षेत्र में छोटे लाट साहब भी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था में निकलेगी। इसके लिए पुलिस और प्रशासन दो महीने से तैयारी कर रहा है। जुलूस मार्ग पर पड़ने वाले दूसरे समुदाय के 67 धार्मिक स्थलों के आसपास बैरिकेडिंग कराकर उन्हें तिरपाल से ढक दिया गया है। सीसीटीवी कैमरे सक्रिय कर कंट्रोल रूम से जोड़े गए हैं।
कंट्रोल रूम से अधिकारी निगाह बनाए रखेंगे। वे अपने मोबाइल फोन से भी इसे लाइव देख सकेंगे। पुलिस ने एसपीओ भी बनाए हैं, जो जुलूस में सहयोग करेंगे।

रूट मार्च के साथ रिहर्सल भी किया
-बृहस्पतिवार को लाट साहब के जुलूस की तैयारियों को अंतिम रूप दिया गया। छोटे और बड़े लाट साहब के जुलूस रूट पर आरएएफ और पीएसी के साथ रूट मार्च के साथ रिहर्सल भी किया गया। बड़े लाट साहब के जुलूस में पुलिस की गाड़ी को प्रतीकात्मक बीच में रखकर चारों ओर आरएएफ का घेरा बनाया गया था। कच्चा कटरा, केरूगंज, हरकुमार पाठक कॉलेज के पास स्थित तिराहे पर रिहर्सल की गई।

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जोन और सेक्टर में बांटा
-बड़े लाट साहब के सात किलोमीटर तक के जुलूस रूट को तीन जोन, आठ सेक्टर और 13 उप सेक्टर में बांटा गया है। बड़े लाट साहब का जुलूस एडीएम प्रशासन संजय कुमार पांडेय और एसपी ग्रामीण मनोज अवस्थी की निगरानी में निकलेगा। छोटे लाट साहब के रूट को चार जोन और नौ सेक्टर व 11 उप सेक्टर में बांटा गया है। यहां एडीएम एफआर अरविंद प्रधान और एसपी सिटी संजय कुमार का नेतृत्व रहेगा।

इतने पुलिसकर्मियों की लगी है ड्यूटी
-रमजान के जुमे के चलते लाट साहब के जुलूस को इस बार काफी संवेदनशील माना जा रहा है। इस वजह से सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए हैं। जिले के 1800 पुलिसकर्मियों के अतिरिक्त गैर जनपद से करीब एक हजार सिपाही, 10 सीओ, 50 निरीक्षक, 200 उपनिरीक्षक, एक कंपनी आरएएफ और एक कंपनी पीएसी तैनात रहेगी। जुलूस की निगरानी में छह ड्रोन कैमरा और 20 वीडियो कैमरामैन छतों आदि पर रिकार्डिंग के लिए लगाए जाएंगे। 150 सीसीटीवी कैमरों से जुलूस की निगरानी की जाएगी।
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आयोजकों की निगरानी में लाट साहब पीकर हुए टुन्न
-पुलिस प्रशासन के साथ लाट साहब भी अपनी तैयारी में जुटे हैं। उन्होंने बृहस्पतिवार को अपनी कुर्सी का रंग-रोगन कर लिया। कमेटी ने उनका चिकित्सीय परीक्षण भी कराया है। लाट साहब ने होली से एक दिन पहले ही शराब पीना शुरू कर दिया है। शाम तक वे पीकर टुन्न हो गए हैं। आयोजन कमेटी के संजय वर्मा ने बताया कि जुलूस के दौरान रास्ते में लाट साहब के लिए शराब का इंतजाम किया गया है।

ढाई सौ साल से भी ज्यादा पुरानी है परंपरा

इतिहासकार डॉ. नानक चंद्र मेहरोत्रा अपनी किताब शाहजहांपुर : ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर में लिखते हैं कि शाहजहांपुर में होली जैसे भाईचारे के त्योहार पर जिस प्रकार का जुलूस निकाला जाता है, वह संपूर्ण प्रदेश में अनूठा है। नवाबों के साथ होली खेलने की परंपरा कब से प्रारंभ हुई, इसकी कोई निश्चित तिथि की जानकारी इतिहास में नहीं मिलती है। माना जाता है कि यह परंपरा किले के अंतिम नवाब अब्दुल्ला खां द्वारा 1746-47 में किले पर फिर से कब्जा करने के बाद प्रारंभ हुई। वे उदार मनोवृत्ति के थे तथा हिंदू और मुसलमान दोनों के प्रिय थे। होली पर नवाब अब्दुल्ला किले के बाहर आकर होली खेलते थे। उसी काल से नवाब साहब निकल आए का नारा प्रारंभ हुआ। 1930 तक होली के नवाब के साथ हाथी, घोड़े व ऊंट भी निकलते थे। अल्पसंख्यक समुदाय की इस आपत्ति पर कि उनके निवास स्थान नीचे हैं तथा बेपर्दगी होती है। सरकार ने ऊंची सवारी के साथ नवाब निकालने पर प्रतिबंध लगा दिया। परिणामस्वरूप भैंसगाड़ी पर ही नवाब निकाले जाने लगे। 1947 में विभाजन के समय दो संप्रदायों के बीच कटुता बढ़ गई। इसके बाद इसका नाम बदलकर लाट साहब कर दिया गया।
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