भले ही सरकारें गंगा और यमुना पर राजनीति करें और नदियों की सफाई के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हों लेकिन खेतों की सिंचाई का बड़ा साधन बनी छोटी छोटी नदियां शासन प्रशासन की अनदेखी से मरने की कगार पर हैं। खन्नौत और गर्रा नदी के बीच स्थित शाहजहांपुर शहर से सटी होने के बाद भी रासायनिक और सीवेज की गंदगी से दूर गर्रा नदी खेतों की सिंचाई की बड़ा साधन है लेकिन अनदेखी के चलते यह रोज तीन बार मर रही है। गर्रा नदी का पाट तीस मीटर और प्रवाह क्षेत्र 18-20 फीट का है। मौजमपुर पंप कैनाल के लिए पानी खींचने की खातिर जब पंप चलता है कि 18-20 फीट का प्रवाह क्षेत्र महज एक फीट रह जाता है। यहां तक की नदी की धार संकरी हो जाती है और उल्टी बहने लगती है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब अप्रैल माह में यह हाल है तो मई और जून में क्या होगा। हालांकि स्थिति से उच्चाधिकारी अवगत हैं लेकिन खेतों की सिंचाई के लिए नहरों में पानी छोड़ने का आदेश बरकरार है। हालांकि डैम पर लगे पंपों के चलना शुरू होने के करीब घंटे भर में ही मुख्य धार सिमट जाती है और किनारों पर रेतीले मिट्टी में बोए गए टमाटर, तरोई, लौकी, कुम्हड़ा, करैला और खीरे की लगी फसल पानी न मिलने से सूखने की कगार पर है।
पिछले सालों में गर्मी के दिनों में चार से छह फीट की गहराई रखने वाली नदी इस समय दो फीट से भी कम की गहराई पर बह रही है। गर्रा की कभी सफाई नहीं कराई गई और न ही कभी कोई योजना बनी। डीसिल्टिंग न होने से नदी के पाट में गाद जमा है और नदी उथली हो गई है। ऐसे में बारिश के दौरान इस नदी में इकट्ठा हुआ पानी रुक नहीं पाता है और नदी की गहराई कम होती जाती है। हालांकि पंप बंद रहने पर नदी अपने स्वरूप में रहती है लेकिन गहराई तब भी कम रहती है।
नहाने वालों को इंतजार
डैम पर तीन पंपों के पक्के मुहाने में नदी से खींचा हुआ जल छोड़ा जाता है। रविवार दोपहर यहां आसपास के गांवों से नहाने आए युवकों और बच्चों की भीड़ जुटी हुई थी। इन्हें बिजली आने का इंतजार है। जैसे ही बिजली आई सभी चिल्लाते हुए कैनाल पंप स्टाफ राजकुमार सिंह, मो. उस्मान, राकेश, रामकिशोर, डोरीलाल, राम बहादुर, अजीत कुमार, अमित मिश्रा की मदद में जुट जाते हैं। बिजली गुल रहने पर डैम का तालाब सूखा रहता है और बिजली आने पर नदी सूख जाती है। ऐसे में सब तालाबनुमा नहर के पक्के मुहाने में गोता लगाने और नहाने में जुट जाते हैं। उन्हें पता है कि पंप चलने पर एक घंटे में ही नदी सूख जाएगी और पानी न मिलने पर पंप बंद कर दिए जाएंगे।
1972 की है मौजमपुर पंप कैनाल
इस नहर को वर्ष 1972 में करीब 100 क्यूसेक की क्षमता पर शुरू किया गया था। वर्ष 1979 -80 में इसे घटाकर 50 क्यूसेक क्षमता का कर दिया गया। यहां से नदी का पानी पहले 300 मीटर लंबी फीडर नहर में छोड़ा जाता है। जहां से 16 किमी लंबी मुख्य नहर, 2.60 किमी लंबी ददरौल माइनर और 5.40 किमी लंबी बैरंग माइनर में पानी की आपूर्ति होती है। नलकूप विभाग ने इस डैम पर नदी से पानी खींचने के लिए तीन नावों पर चार मोटर पंप लगा रखी हैं। दो पंप 20-20 क्यूसेक, एक दस क्यूसेक और एक स्टैंड बाई पंप 12.5 क्यूसेक क्षमता का है। इनमें से एक साथ तीन पंप चलते हैं। इस समय 30-40 क्यूसेक पानी नहर में छोड़ा जा रहा है। इसमें भी रेत और मिट्टी का मात्रा करीब 40 फीसदी है। नदी का पानी कम होने पर पंप सिल्ट भी खींच रहा है और इससे सक्शन प्वाइंट पर कटान हो रहा है। इससे पंप वाली नाव नदी की ओर झुक गई है।
मौजमपुर पंप कैनाल की क्षमता 50 क्यूसेक है लेकिन अभी गर्रा नदी से 30 क्यूसेक पानी ही नहर में छोड़ रहे हैं। पंप चलने के दौरान नदी सूख जाती है तो ट्रिपिंग के कारण पंप बंद करने पड़ते हैं। नदी के गिर चुके जलस्तर और हालात से उच्चाधिकारियों को अवगत करा दिया है। - शशि शेखर दीक्षित, सहायक अभियंता, नलकूप खंड शाहजहांपुर प्रभारी मौजमपुर पंप नहर