अंग्रेजों को खदेड़ने में अपनी जान की बाजी लगाने वाले धर्मनिरपेक्ष दोस्ती के मिसाल शाहजहांपुर के क्रांतिकारी दोस्तों का वह आंगन या तो बिक चुका है या ढह चुका है जहां वे पले - बढ़े थे। खिरनी बाग में पं. राम प्रसाद बिस्मिल के घर पर उनके परिवार का कोई भी सदस्य नहीं है क्योंकि वह अब तक दो बार बिक चुका है। एमनजई जलालनगर स्थित अशफाक का पुश्तैनी मकान खंडहर हो चुका है। यहां एक हिस्से में क्रांतिकारी के प्रपौत्रों ने नया निर्माण कराया है। ये दोनों ही दोस्त ऐतिहासिक काकोरी कांड के 10 चुनिंदा क्रांतिकारियों में शामिल थे जिन्होंने सरकारी खजाना लूटकर तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती दी थी।
दोनों ही क्रांतिकारियों की संपत्ति जब्त करने और कुर्की तक की कार्रवाई हुई। यहां पं. बिस्मिल के खिरनी बाग वाले स्थित मकान नंबर 358 पर पहुंचने पर पता चला कि अब यहां सुनील कुमार रहते हैं। उनके स्वर्गीय दादा श्रीनारायण लाल ने लाहौर टेलर वाले से यह मकान करीब 50 साल पहले खरीदा था। उन्होंने बताया कि पंडित जी को फांसी होने के करीब महीने भर बाद ही उनकी बहन ने यह मकान बेच उक्त टेलर को बेच दिया था। उधर जलालनगर स्थित अशफाक के ढह चुके पुश्तैनी मकान आंगन और दीवारों से जुड़ी यादों का ब्योरा देते हुए उनके प्रपौत्र अशफाक उल्ला खां, अफाक उल्ला खां और शादाब उल्ला खां ने बताया कि क्रांतिकारियों के जीवन से जुड़े इन स्थानों को ऐतिहासिक धरोहर के रूप में सहेजने के लिए कई बार लिखा गया एवं पं.बिस्मिल के घर को संग्रहालय बनाने की भी कुछ लोगों ने मांग रखी लेकिन किसी भी सियासी दल की सरकार ने इसमें गंभीरता से रुचि नहीं ली।
मिशन स्कूल की छत से कूदकर भागे थे दोनों छात्र
शाहजहांपुर। शहर के रोशनगंज स्थित मिशन स्कूल के नाम से मशहूर ब्रिटिश काल के एबी रिच इंटर कॉलेज के आसपास ठेला - खोमचे की दुकान लगाने वाले हों या यहां पढ़ाने वाले अध्यापक और दफ्तरी बाबू, सभी यहां के दो होनहार छात्रों की देशभक्ति के बारे में बताते नहीं अघाते। शनिवार को यहां रिकार्ड आलमारी से काफी खोजबीन में वह रजिस्टर निकाला गया जिसमें यहां छात्र रूप में अशफाक उल्ला खां का ब्योरा दर्ज है। वर्ष 1919 में वह यहां कक्षा आठ ब में पढ़ते थे और उनकी छात्र पंजिका संख्या 2216 थी। यह कक्षा भवन के ऊपरी हिस्से में थी। पं. बिस्मिल इनसे ऊपरी कक्षा में अध्ययनरत थे। प्रभारी प्रधानाचार्य ईआर डाइसल ने बताया कि उसी दौरान एक दिन अचानक ब्रिटिश पुलिस ने यहां घेराबंदी और तलाशी लेनी शुरू की। उन्हें क्रांतिकारियों से मिलने - जुलने वाले इन दो छात्रों की तलाश थी। यह जानकारी मिलने पर तत्कालीन हेडमास्टर रूफस चरन ने दोनों छात्रों को कूदकर भागने की सलाह संदेश के रूप में कक्षा में भेजवाई। दोनों छात्र छत से कूदे थे और पास के बाग की ओर से निकल भागे थे।
बरसी पर आज विशेष आयोजन
शाहजहांपुर। रविवार को काकोरी कांड की बरसी पर काकोरी शहीद स्मारक पर विशेष आयोजन होगा। उसमें शाहजहांपुर के शहीद क्रांतिकारी परिवारों के सदस्यों को भी बुलाया गया है। घटना वाले दिन नौ अगस्त 1925 की रात शाहजहांपुर स्टेशन से लखनऊ को जाने वाली गाड़ी सहारनपुर पैसेंजर ट्रेन में ये सवार हुए थे। टीम के अगुवा पं. बिस्मिल थे जबकि चंद्रशेखर आजाद के साथ अशफाक भी बतौर सदस्य उसमें शामिल थे। शाहजहांपुर के इस युवा पठान पर जंजीर खींचकर ट्रेन रोकने की जिम्मेदारी थी और बाद में इसी ने लूटे गए भारी भरकम संदूक का मुंह खोला था। उस कांड में पकड़े जाने पर गोरखपुर जेल में 19 दिसंबर 1927 को इस दल के अगुवा को गोरखपुर जेल में तो उनके साथी को फैजाबाद जेल में फांसी हुई। फांसी से पहले फांसीघर के दरवाजे पर पहुंचने पर पं. बिस्मिल ने कहा था कि वह साम्राज्यवाद का विनाश चाहते हैं तो अशफाक ने कहा कि उनके हाथ इंसानी खून से कभी नहीं रंगे, उन पर जो इल्जाम लगाया गया वह गलत है और खुदा के यहां उनका इंसाफ होगा।