सरकार की ओर से चलाए जा रहे ‘स्कूल चलो अभियान’ का उद्देश्य पूरा होता नजर नहीं आ रहा है। जिन बच्चों केहाथों में कलम और किताबें होनी चाहिए वह होटलों, ढाबों, किराने की दुकानों पर हाड़तोड़ मेहनत करते देखे जा सकते हैं।
गौरतलब है कि अभियान के तहत पांच साल से बड़े बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित कर ज्यादा से ज्यादा बच्चों को शिक्षित किया जाना है, परंतु नगर के अधिकतर प्रतिष्ठानों पर बच्चों के खुलेआम हो रहे शोषण को रोकने के लिए कहीं से भी पहल होती नहीं दिख रही है। खेलने और पढ़ने की उम्र के तमाम बच्चे नगर के इन होटलों पर जूठे बर्तन साफ कर रहे हैं और मात्र चार-पांच सौ रुपये माह की पगार पर सुबह से लेकर देर शाम तक हाड़तोड़ मेहनत के बाद होटल मालिक और ग्राहकों की प्रताड़ना की पीड़ा लेकर घर लौटते हैं।
होटलों की तरह ही कसबे की कपड़ा, किराना, फल, सब्जी, किताब, बर्तन, सर्राफा, प्रिटिंग प्रेस, बिजली उपकरण आदि की दुकानों पर इन बच्चों से झाड़ू पोछा लगवाने से देर रात शटर बंद होने तक काम लिया जाता है। वाहनों की मरम्मत करने वाले वर्कशापों पर भी काम सिखाने के बहाने उनका खुलेआम शोषण किया जाता है। देश का भावी भविष्य होटल पर बर्तन साफ करने का सफर आज भी अनवरत जारी किए हुए है। शिक्षा और श्रम विभाग केअधिकारी भी सबकुछ जानकर अंजान बने हुए हैं। ऐसे में स्कूल चलो अभियान की सफलता संदिग्ध बनी हुई है।
कहां-कहां काम कर रहे हैं छोटे बच्चे
0 होटलों पर तमाम बच्चे धो रहे हैं जूठे बर्तन।
0 ईंट भट्ठों पर पढ़ने और खेलने की उम्र में माता-पिता के साथ ईंट पाथने में लगे हैं तमाम बच्चे।
0 किराने की दुकानों और वर्कशाप पर पिस रहा है बचपन।