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भाषा के चौकीदार को गालिब पुरस्कार

Wed, 20 Jan 2016 11:43 PM IST
शाहजहांपुर।
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 ऐसा बहुत कम देखने और सुनने को मिलता है कि जिसको पढ़कर और सुनकर कोई हुनर हासिल किया जाए, बाद में उसी के नाम का पुरस्कार भी मिल जाए, लेकिन ऐसा हमीद खिजर के साथ हुआ है। हमीद खिजर ऐसे शायर हैं, जिनको बचपन से गालिब को पढ़ने और सुनने का शौक लग गया। यह शौक धीरे-धीरे उनकी अपनी शायरी में बदलता चला गया। जानते हैं, आज यही शौक खिजर को राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान की ओर से दिया जाने वाला मिर्जा असदउल्ला खां गालिब पुरस्कार दिला रहा है। पुरस्कार के तहत उन्हें 51 हजार रुपये की पुरस्कार राशि भी दी जाएगी। यह पुरस्कार एवं सम्मान समारोह 13 मार्च को यशपाल सभागार हिंदी संस्थान लखनऊ में होगा।
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हमीद खिजर की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्हें बचपन से ही शायरी पढ़ने और लिखने का शौक लग गया था। गालिब की गजलों को पढ़कर उन्हें भी लिखने का शौक लग गया। वह महज आठवीं पास हैं, लेकिन उनकी शायरी उच्च क्वालिटी की है। उन्होंने यूं मेरी जिंदगी में सवेरा नहीं हुआ, मैं जिसको चाहता था वो मेरा नहीं हुआ नामक पहली गजल तब लिखी जब वह कक्षा छह में पढ़ते थे। अपने आरंभिक उस्ताद अयूब हसन को जब उन्होंने गजल सुनाई तो वह तारीफ किए बिना नहीं रह सके। इसके बाद वह धीरे-धीरे इस शौक में फलते-फूलते गए।
कहने को तो हामिद खिजर लोक निर्माण विभाग में चतुर्थश्रेणी कर्मचारी (चौकीदार) हैं, लेकिन सही मायने में वह भाषा (उर्दू-हिंदी) के चौकीदार हैं। बोले: जिसको पढ़कर लिखने का शौक लगा, आज उन्हीं के नाम का पुरस्कार मिलना फख्र की बात है। पूछने पर बताया कि 51 हजार रुपये की राशि बहुत बड़ी होती है, लेकिन यह राशि के सामने गालिब पुरस्कार अधिक बड़ा है। पुरस्कार से हौसला बढ़ता है, यकीनन उन्हें भी हौसला मिला है, इस पुरस्कार को वह जाया नहीं होने देंगे।
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शहर के मोहल्ला दिलाजाक में वह पत्नी शबनम बानों और दो बेटों मो. सैफ और सुहेल के साथ रहते हैं। उनकी अब तक चार पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। इसमें उर्दू गजलों का संग्रह लमसे शबनम और लरजते साए तथा हिंदी गजल संग्रह धड़कन और ठंडी हवा के झोके शामिल हैं। मिर्जा गालिब पुरस्कार के बावत खिजर बोले कि उन्हें यकीन नहीं हो रहा कि उनकी मेहनत का सिला ऊपर वाला इस रूप में देगा। परिवार ही नहीं, मित्र और विभागीय अधिकारी और कर्मचारी भी बहुत खुश हैं। खिजर ने मुफलिसी को इस तरह शब्दों में बांधने का काम किया कि मुफलिसी ने मेरे हालात बिगाड़े कैसे, देखिए अबके गुजरते हैं ये जाड़े कैसे। सच है चौखट से नहीं होती है हिफाजत घर की, तंग हाली है लगाओगे किबाड़े कैसे।
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इसी तरह मौजूदा हालात पर उन्होंने लिखा कि सुकून-ए-दिल की बातें अब फकत ख्वाबों की बातें हैं, घरों में आ गए हों बम तो कैसे नींद आएगी।
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