गन्ने को बेचकर भुगतान मिलने पर तमाम कार्य पूरा करने का सपना संजोने वाले किसानों के अरमान सीने में ही दफन होकर रह गए हैं। तमाम किसान चीनी मिल से चीनी खरीदकर दुकानदारों को कम रेट पर बेचकर घर का खर्च चला रहे हैं।
कहावत है कि गन्ना सभी फसलों का ताऊ है। गन्ने को नगदी फसल माना जाता है। बारिश आदि में अन्य फसलों की अपेक्षा गन्ने को कम नुकसान पहुंचता है। इसी लिए किसान गन्ने की खेती करता है, लेकिन कुछ वर्षों से भुगतान में आ रही समस्याओं के चलते किसान का गन्ने से मोहभंग हो गया है। दो वर्षों से गन्ने की खेती के क्षेत्रफल में भी गिरावट आई है। इस वर्ष बेचे गए गन्ने का भुगतान भी चीनी मिलों में फंसा हुआ है। मकसूदापुर चीनी मिल किसानों को चीनी लेने की सुविधा दे रहा है। इसी प्रकार किसान सहकारी चीनी मिल से भी किसानों को चीनी लेने की सुविधा दी गई है, लेकिन गन्ने का ज्यादा भुगतान होने के कारण किसान इतनी चीनी लेकर क्या करेगा। भुगतान नहीं मिलने पर किसान चीनी मिल से मजबूरी में चीनी उठा रहा है। वह उसे औने-पौने दाम में दुकानदारों को बेच रहा है। इससे उसे भारी घाटा हो रहा है। भाकियू के जिला उपाध्यक्ष खुटार के गांव पुनौती निवासी प्रभजोत सिंह ने किसानों को गन्ने का भुगतान नहीं देने पर चीनी मिल स्वामियों की कड़ी निंदा करते हुए आंदोलन की चेतावनी दी है।
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छह जनवरी तक का भुगतान भेजा
पुवायां। बजाज चीनी मिल मकसूदापुर ने सात नवंबर से 14 मार्च तक गन्ने की खरीद की। मिल ने अब तक केवल नौ दिसंबर तक खरीदे गए गन्ने का ही भुगतान किया है। मिल पर खरीदे गए गन्ने का लगभग 58 प्रतिशत तक बकाया है। किसान मिल से लगभग एक करोड़ रुपये की चीनी रोजाना उठा रहे हैं। उधर, पुवायां की किसान सहकारी चीनी मिल के प्रबंधक डीके सक्सेना ने बताया कि मिल की ओर से 13 फरवरी तक खरीदे गए गन्ने का भुगतान कर दिया गया है। मिल की 52 करोड़ की लिमिट थी। लिमिट के रुपये लेकर भुगतान कर दिया गया है। लिमिट बढ़ाने के लिए जिलाधिकारी ने शासन को पत्र भेजा है। अभी अनुमति नहीं मिली है। किसान चाहे तो मिल से चीनी ले सकते हैं। मिल पर गन्ने के 15 से 16 करोड़ रुपये बाकी हैं।