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Jyeshtha Purnima: इस देवी मंदिर में हुआ था श्रीकृष्ण-रुक्मणी का विवाह, जेष्ठ पूर्णिमा पर लगता है आस्था का मेला

Sat, 03 Jun 2023 07:04 PM IST
मुकेश कुमार संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहांपुर

सार

लोगों का मानना है कि रुक्मणी के पिता रुकुम का गांव कुंडलपुर है, जहां पर देवी मंदिर में श्रीकृष्ण और रुक्मणी ने विवाह के फेरे लिए थे। यहां हर साल जेष्ठ पूर्णिमा पर मेला लगता है। 
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मजरा दहशहर स्थित देवी मंदिर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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शाहजहांपुर जनपद के कुंडलिया गांव के मजरा दहशहर स्थित देवी मंदिर में जेष्ठ माह की पूर्णिमा से एक सप्ताह तक लगने वाला मेला रविवार से शुरू हो रहा है। इसको लेकर तैयारियां पूरी कर ली गई है। बताया जाता है कि यह मेला 200 साल से अधिक प्रचीन है। प्रत्येक वर्ष यहां मेला लगता है। 

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प्राचीन मेले में बड़ी संख्या में लोग आते हैं। मंदिर में देवी मां की पूजा कर मनौती मांगते हैं। मनोकामना पूरी होने पर भक्त देवी मंदिर में प्रसाद और घंटा चढ़ाने पूर्णिमा पर ही आते हैं। इसलिए मेले का महत्व और बढ़ जाता है। पूर्णमासी पर लगने वाले मेले को लेकर दुकानें सज गई हैं। झूले भी लगे हैं। 

मंदिर की है प्राचीन मान्यता

प्राचीन मान्यता से जुड़ा होने के कारण इस मेले का और भी अधिक महत्व है। लोगों का मानना है कि रुक्मणी के पिता रुकुम का गांव कुंडलपुर है, जहां पर देवी मंदिर में श्रीकृष्ण और रुक्मणी ने विवाह के फेरे लिए थे। रुकुम के गुरु अमरनाथ के आश्रम के अवशेष अभी भी यहां मौजूद हैं। जिसे लोग अमरी कूड़ा के नाम से जानते हैं। यहीं पर एक प्राचीन कुआं, वट वृक्ष भी है, जिसे लोग देखने के लिए दूर-दूर से आते हैं।

मंदिर में देवी प्रतिमा - फोटो : अमर उजाला

चार बार रामगंगा के कटान में कट चुका है मंदिर

ग्रामीण बताते हैं कि भक्तों की आस्था से जुड़ा यह मंदिर पहले बहुत ही आलीशान था। लेकिन रामगंगा के कटान में चार बार इस मंदिर को क्षति पहुंची। हर बार मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया। मंदिर के पुजारी गोस्वामी के परिवार के हैं।

अपनी भव्यता खोने लगा मेला

कभी मेले में शाहजहांपुर के अलावा जनपद फर्रुखाबाद, मुरादाबाद, बदायूं के दुकानदार भी दुकाने लगाने आते थे। काश्तकार इसी मेले में कृषि उपकरण खरीदकर खेती की शुरूआत करते थे। दरी-कलीन भी खूब खरीदारी होती थी। 
 
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महिलाएं भी अपने लिए उपयोगी वस्तुओं की खरीदारी करती थीं। इसके साथ ही सुरक्षा व्यवस्था को पुलिस चौकी बनाई जाती थी। लेकिन अब अधिकांश वस्तुएं आसपास के कस्बों में मिलने के कारण मेले का स्वरूप बदल गया है और औपचारिकता मात्र रह गया है। जिससे मेला अपनी भव्यता खोने लगा है।
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