मानसून एक्सप्रेस की लेटलतीफी किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें डालने लगी है। दरअसल, सात लाख किसानों वाले कृषि प्रधान जिले में अधिसंख्य कम जोत वाले ऐसे छोटे किसान हैं, जिन्हें खरीफ सीजन में नहरों या फिर दूसरों की बोरिंग से सिंचाई पर निर्भर रहना पड़ता है। इसके बदले उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ती है इसलिए खरीफ फसलों के लिए मानसून का बेसब्री से इंतजार रहता है। यही वजह है कि अभी तक बमुश्किल 35 हजार हेक्टेयर में धान पौध लग सकी है जबकि 2.11 लाख हेक्टेयर रोपाई का लक्ष्य है।
मौसम विशेषज्ञों और कृषि वैज्ञानिकों का मानना है उत्तर भारत में मानसून जून के दूसरे सप्ताह तक दस्तक दे देता है। इस बार प्री मानसून बरसात समय से शुरू हो गई, लेकिन झमाझम बारिश के लिए बादल तरसा रहे हैं। इस कारण रबी फसलों की कटाई के बाद खाली हुए खेत पिछले दिनों हुई मामूली बरसात में जुताई के लायक भी नहीं हो सके, जबकि जून बीत गया। सिर्फ उन्हीं साधन संपन्न बड़े फार्मर ही धान की रोपाई का काम निपटा सके हैं।
सामान्य से 75 प्रतिशत कम हुई बारिश
मौसम विभाग के आंकड़ों पर नजर डालें तो एक जून से अब तक सामान्य से करीब 75 फीसदी बारिश कम हुई है। गन्ना शोध परिषद के मौसम विश्लेषक सुरेंद्र सिंह यादव के अनुसार जिले में जून और जुलाई माह में 200-200 मिमी सामान्य वर्षा होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि 15 जून से 15 सितंबर तक आदर्श वर्षा मानक 1000 मिमी है, लेकिन पिछले कुछ सालों से बारिश घट रही है। मासांत तक 49 मिमी बारिश हो पाई है, लेकिन अगले कुछ दिनों में बारिश होने पर धान की रोपाई में तेजी आने की उम्मीद है।
खराब पड़े हैं दो दर्जन सरकारी नलकूप
सिंचाई के लिए सरकारी नलकूप वर्षा का बेहतर विकल्प बन सकते हैं, लेकिन जिले में करीब दो दर्जन ट्यूबवेल अरसे से खराब हैं। खास यह है कि कुल 561 नलकूपों में केवल 482 क्रियाशील हैं। उनमें से 14 ट्यूबवेल बिजली और तकनीकी खराबियों के कारण कई साल से बंद हैं। नलकूपों की खराबी का मुद्दा हाल ही में हुई सिंचाई बंधु की हर बैठक में उठता है, लेकिन सुधार की गति बेहद धीमी है। 121 नहरों में कई ऐसी माइनर हैं, जो कुलाबों की समस्या के कारण अंतिम छोर पर सूखी पड़ी रहती हैं।
आसमान में टकटकी लगाए पुवायां के छोटे किसान
पुवायां। कई दिन से हो रहे बादल बिना बरसे ही जा रहे हैं। यह देखकर किसानों ने भी धान की रोपाई का काम रोक दिया है। जिले में सर्वाधिक अन्न उत्पादन वाली इस तहसील में धान की रोपाई काफी हद तक बरसात पर निर्भर करती है। धान की रोपाई प्रभावित होने से श्रमिकों की मारामारी भी नहीं रह गई है, जिससे मजदूरी की दरें भी घट गई हैं। किसान पौध रोपाई के लिए इंतजार की नीति अपना रहा है।
आंकड़े देखें तो मानसून सीजन की बारिश पहले जैसी रफ्तार से हो रही है। पिछले साल जून से तुलना करें तो इस वर्ष जून माह में जिले में 15 मिमी अधिक वर्षा रिकार्ड की गई। मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार अगले कुछ दिनों में भारी वर्षा होगी जिससे धान की रोपाई का काम तेजी पकड़ सकेगा।