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साठा धान की रोपाई में जुटे किसान

Tue, 10 Mar 2015 06:19 PM IST
पुवायां।
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तहसील पुवायां में साठा धान की रोपाई का काम जोरों से शुरू हो गया है। इससे श्रमिकों को रोजगार मिलने से उनके चेहरे खिल उठे हैं। वहीं साठा केबढ़ते क्षेत्रफल ने वैज्ञानिकों और पर्यावरण की रक्षा से जुडे़ संगठनों के लोगों को चिंता में डाल दिया है।
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पुवायां तहसील के कुल कृषि भूमि के लगभग 40 प्रतिशत भाग पर साठा धान की खेती की जाती है। पौध तैयार होने के साथ ही बारिश ने साठा धान की रोपाई के काम को रफ्तार दे दी है। बारिश से गेहूं, सरसों, मसूर, आलू की फसल को नुकसान हुआ है, लेकिन साठा लगाने वालों को राहत मिली है। आलू की खुदाई होने के बाद खाली खेतों में साठा धान लगने लगा है। बड़े फार्मर सुबह होते ही ट्रैक्टर ट्राली दूरदराज के गांवों में भेज देते हैं। गांवों से श्रमिकों को लाकर पौध की रोपाई कराई जा रही है। इससे लोगों को रोजगार मिल गया है।
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घातक है साठा का क्षेत्रफल बढ़ना
साठा धान के बारे में वैज्ञानिकों का कहना है कि यह फसल पर्यावरण के साथ-साथ मानव जीवन के लिए भी कई तरह से घातक है। साठा से भूमि की उर्वरा शक्ति तो कम हो ही रही है, सिंचाई के लिए पानी केअंधाधुंध दोहन से जलस्तर में लगातार गिरावट आ रही है।
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साठा धान में हर पांचवें दिन सिंचाई करनी पड़ती है। इस प्रकार 90 दिन केफसल चक्र में औसतन 15-16 बार पानी लगाना पड़ता है। इसके अलावा सिंचाई के लिए डीजल पंपिंग सेटों के चलने से पर्यावरण भी प्रभावित होता है। सिंचाई के बहुतायत में पानी की जरूरत होने के कारण ही पंजाब सरकार ने साठा धान की खेती पर पाबंदी लगा रखी है। शाहजहांपुर के उप कृषि निदेशक डॉ. आरके यादव के अनुसार साठा से भूमि का क्षरण होने के साथ- साथ पीएच बैलेंस भी डाउन हो जाता है। इससे अन्य फसलों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। वैज्ञानिक दो से ज्यादा फसलें उगाने को बुरा नहीं मानते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार साठा के बजाय तरबूज, खरबूजा, खीरा और सब्जियां उगाकर कम लागत में अधिक लाभ लिया जा सकता है और इससे गिरते जलस्तर पर भी किसी हद तक काबू पाया जा सकता है।
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