स्वामी शुकदेवानंद महाराज के निर्वाण की अर्द्ध शताब्दी के उपलक्ष्य में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन कथाव्यास श्रवणानंद सरस्वती ने भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन धारण लीला के माध्यम से बताया कि भगवान को अहंकार किसी का भी प्रिय नहीं होता है, फिर चाहें वह देवराज इंद्र ही क्यों न हों। अहंकार जीव का विनाश कर देता है।
कथा व्यास ने कहा कि भगवान जहां गरीब और अमीर के भेद को मिटाकर सभी को एक साथ मिलकर रहने का संदेश देते हैं, वहीं जीव को ईश्वर का अंश मानकर व्यवहार करने का संदेश देते है। महारास का वर्णन करते हुए स्वामी जी ने बताया कि कृष्ण ने वृंदावन से मथुरा पहुंचने पर कुशल राजनीतिज्ञ होने का परिचय दिया। अर्थात भगवान ने सठे साठ्यम् समाचरेत की उचित व्यवहार नीति अपनाई।
उद्धव के बृज आगमन पर बृज महिमा का बखान करते हुए महाराज ने बताया कि उद्धव जी ने जब वृंदावन के गोप गोपियों के प्रेम को देखा तब उन्हें लगा कि ऐसे प्रेमियों के तो पैरों की धूल भी अगर मस्तक पर पड़ जाए तो कल्याण हो जाए। उद्धव जी भगवान से प्रार्थना करने लगे कि हे भगवान आप मुझे बृज में गुल्म लता या औषधि जो भी छोटे वृक्ष बना दें जिससे बृजवासी चलें तो उनके पांव की धूल हमारे मस्तक पर गिरती रहे। इस प्रसंग में प्रेम की महिमा का वर्णन स्वामी जी ने किया।
पूर्व में आचार्य रामअवतार ने स्वस्तिवाचन कर आरती निराजन कर पुष्पांजलि करायी। कथा में महामंडलेश्वर स्वामी असंगानंद महाराज तथा स्वामी चिन्मयानंद महाराज का आशीर्वाद श्रोताओं को प्राप्त हुआ। मुख्य यजमान रजनीश गुप्ता के अतिरिक्त प्राचार्य डॉ. अवनीश मिश्र, डॉ. मीना शर्मा, श्रीमती सोनम, डॉ. श्रीकांत मिश्र ने आरती की। इस अवसर पर रामसागर यादव, डॉ. अनुराग अग्रवाल, डॉ. आलोक मिश्र, डॉ. प्रभात शुक्ल, डॉ. प्रशांत अग्निहोत्री, डॉ. विनीता श्रीवास्तव, डॉ. संदीप अवस्थी, डॉ. शालीन सिंह, डॉ. राजबहादुर यादव, डॉ. अर्चना गर्ग, सुषमा सिंह आदि मौजूद रहे। प्रात: गायत्री महायज्ञ हुआ।