बसंत पंचमी पर पतंगबाजी की परंपरा के निर्वाह को युवाओं ने शुक्रवार को पतंग, डोर, मांझा आदि खरीदने में खासी दिलचस्पी दिखाई। पिछले कई दिनों से खराब मौसम सुधरा और दिन में धूप खिली तो आसमान में पतंगें भी छाने लगीं। मंडी, बहादुरगंज, हद्दफ आदि कई क्षेत्रों में पतंग की दुकानों पर बच्चों, किशोरों और युवाओं की खासी भीड़ रही। दुकानदारों के अनुसार कपास के दाम बढ़ने से धागा और मांझा की कीमतों में बढ़ोत्तरी के बावजूद बिक्री में काफी उछाल रहा।
हर साल की तरह इस बार भी बसंत पंचमी से एक दिन पहले ही रंगबिरंगी पतंगें दुकानों के आगे सजने लगीं। मौसम ने साथ दिया और सुबह आसमान साफ होने के साथ धूप खिली तो पतंगबाजों के चेहरे भी खिल उठे। तमाम विक्रेताओं ने मौके का भरपूर लाभ उठाया। तमाम लोगों ने थोक में पतंगे खरीदकर उन्हें बिक्री के लिए फुटपाथों पर सजा लिया। इसके साथ ही पतंगों की बिक्री का दौर शुरू हो गया जो दिन ढले तक चलता रहा।
बाजार में इस बार एक रुपये से लेकर 50 रुपये तक की कीमत वाली पतंगें बिक रही हैं। दुकानदारों के अनुसार कपास के दामों में बढ़ोत्तरी से धागा और मांझा की कीमतें पांच से दस फीसदी बढ़ गईं हैं। नौ सौ मीटर धागे वाली डोर की रील 40 से बढ़कर 45 रुपये हो गई और मांझा चरखी भी करीब 20 रुपये बढ़कर क्वालिटी के अनुसार 70 से 150 रुपये में बिक रही है। बावजूद इसके पतंग उड़ाने के शौकीनों ने महंगाई की परवाह किए बगैर दर्जनों पतंगें और चर्खियां खरीदीं।
खरीदारों को लुभा रहे अलबेले नाम
बाजार में अलग-अलग बनावट वाली पतंगों के अलबेले नाम भी ग्राहकों में खूब प्रचलित हो रहे हैं। उदाहरण के लिए चांदतारा, मुड्ढेदार, लंगोट, गिलहरा, अद्घी, पौनी, दुपट्टी, तिरंगा, पूंछदार आदि तरह-तरह की बनावट वाली पतंगें उनके नाम से पतंगबाज खरीद रहे हैं।
प्रशासनिक सख्ती से नहीं दिखा चायनीज मांझा
पड़ोसी जनपद बरेली समेत कई जिलों में चायनीज मांझा से लोगों के घायल होने की घटनाओं के मद्देनजर कुछ माह पहले चायनीज मांझे की बिक्री पर लागू की गई प्रशासनिक सख्ती का असर पतंगों के बाजार पर साफ दिख रहा है। महमंद जंगला के पतंग और मांझा निर्माता जमील अहमद के अनुसार चायनीज मांझा नायलोन की डोर पर फेविकोल लगाकर शीशा घिसे जाने से खतरनाक साबित हुआ तो दुकानदारों ने उसकी बिक्री रोक दी। हां, भारी पतंगें उड़ाने के लिए नायलोन डोर की रीलें खूब बिक रही हैं।