गन्ने के खेती को बहुफसली विकल्पों के साथ जलवायु परिवर्तन सरीखी भविष्य में पेश आने वाली जटिल चुनौतियों से पार पाने में विज्ञानी शोध में जुटें ताकि भविष्य में पेश आने वाले विषम हालात से किसान अप्रभावित रहते हुए उन्नत लाभ हासिल करें। ऐसा होने पर ही प्रदेश और देश को समृद्ध करने में सक्रिय भागीदारी निभाई जा सकेगी। हो रहे शोध के नतीजों का जमीनी स्तर किसानों के यहां क्रियान्वयन करते हुए उन्हें इसका लाभ दें तभी शोध की सार्थकता है। उ.प्र. गन्ना शोध परिषद के 100 वर्ष पूरे होने पर शताब्दी समारोह के क्रम में आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में बुधवार को मुख्य अतिथि कानपुर के चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सुशील सोलोमन ने यह बातें कहीं। पधारे अतिथियों, विज्ञानियों एवं शोधार्थियों का स्वागत परिषद के निदेशक डॉ. बीएल शमा ने किया। इसके बाद सेमिनार का सोविनियर, 100 वर्ष की शोध यात्रा, प्रजातीय पहचान संबंधित पुस्तक, शोध परिणामों की वार्षिक रिपोर्ट और ट्रेंच विधि वाली गन्ने की खेती की सीडी का लोकार्पण किया गया। अपने संबोधन में गन्ना प्रजनन संस्थान (कोयंबटूर) के निदेशक डॉ. बक्षी राम ने कहा कि दक्षिण भारत में पानी का संकट नजर आने लगा है। अत: उत्तर भारत में आने वाली इस समस्या पर पहले से ही मंथन कर उत्पादन वृद्धि हेतु प्रयास करना चाहिए। सुझाया कि गन्ने की ऐसी नई प्रजातियों के बीज विकसित हों जैसे अन्य फसलों यथा धान, गेहूं के बीज होते हैं। विशिष्ट अतिथि उ.प्र. गन्ना शोध परिषद के उपाध्यक्ष राम कृष्ण यादव ने कहा कि परिषद के विज्ञानियों ने सतत शोध से ज्यादा उपज और ज्यादा परता देने वाले गन्ना बीजों को विकसित कर सूबे के चीनी मिलों में परता बढ़ाकर अच्छे राजस्व का मुनाफा कराया है। डीएम राम गणेश ने कहा कि देश और प्रदेश विकसित करने में विज्ञानियों का भी अहम योगदान है एवं परिषद के विज्ञानी लगातार गन्ने का रकबा बढ़ाने और अच्छी पैदावार से किसानों को लाभ दिलाने में बुनियादी भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। राष्ट्रीय शर्करा संस्थान कानपुर के निदेशक डॉ. नरेंद्र मोहन ने शर्करा उत्पादन में होने वाली क्षति के सुधार पर बल दिया। अपर गन्ना आयुक्त (शोध एवं समन्वय) वीके शुक्ला ने कहा कि गन्ने का ड्राल प्रतिशत बढ़ाकर निश्चित रूप से प्रदेश के चीनी उत्पादन में वृद्धि कर सकते हैं। संचालन डॉ. प्रियंका सिंह ने और आभार ज्ञापन डॉ. आरके सिंह ने किया। उद्घाटन सत्र में संयुक्त निदेशक डॉ. अतुल सिंह, डॉ. सुचिता, डॉ. आईएस सिंह, डॉ. वीरेश आदि मौजूद थे।