शाहजहांपुर। तीन साल पहले 19 मार्च 2017 को प्रदेश की सत्ता मेें आने से पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ ने विधानसभा चुनाव के दौरान जनता की रोजमर्रा की जिंदगी को आसान बनाने के लिए कई घोषणाएं की थीं। सरकार ने शुरुआती वर्ष 2017 मेें प्रदेश की सड़कों को गड्ढा मुक्त बनाने की दिशा मेें पहल की और इस योजना पर जिले में भी अमल हुआ, लेकिन पहली बरसात में ही सड़कें उधड़ने लगीं। यही नहीं, कृषि, पेयजल, स्वास्थ्य, कानून व्यवस्था में सुधार, शिक्षा आदि क्षेत्रों में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हो सकी। कर्जमाफी योजना किसानों के लिए छलावा साबित हुई और दलहन उत्पादन का रकबा भी नहीं बढ़ सका, जिससे कृषि से किसानों की आय दोगुनी होने का सपना पूरा नहीं हो सका।
1539 किमी सड़कों के गड्ढे फिर हुए जस के तस
योगी सरकार ने 15 जून 2017 को पहली कैबिनेट बैठक में सूबे की सड़कों को गड्ढामुक्त करने का अभियान चलाने की घोषणा की और इसके लिए संबंधित विभागों को 15 दिन का समय दिया। इस दौरान जिले मेें विभिन्न विभागों को 1539 किमी सड़कों पर बजरी-कोलतार से पैचवर्क कर गड्ढे पाटने का लक्ष्य दिया गया। बेहद जल्दबाजी में हुए इस कार्य के तहत लोक निर्माण विभाग ने 1406 किमी, कृषि उत्पादन मंडी परिषद ने 89.38 किमी, नगर निकायों ने 29.26 किमी, जिला पंचायत ने 6.42 किमी और गन्ना विभाग ने 8.66 किमी सड़कों के गड्ढे पाटने पर करोड़ों की रकम फूंक दी, लेकिन कार्य की गुणवत्ता पर कोई ध्यान नहीं दिया। नतीजे में मानसून की पहली बरसात में अधिकांश सड़कें फिर से गड्ढा युक्त होने लगीं। फिलहाल जर्जर सड़कों की दशा सुधारने पर सिस्टम कोई ध्यान नहीं दे रहा।
कर्ज माफी के नाम पर किसानों से हुआ छलावा
योगी सरकार की कर्जमाफी योजना के नाम पर तमाम किसानों के साथ सिर्फ छलावा हुआ। 4.57 लाख किसानों में अधिकतर लघु-सीमांत श्रेणी के ऐसे साधनहीन किसान हैं, जिन्हें हर फसली सीजन में मौसम की मेहरबानी पर निर्भर रहना पड़ता है। रबी सीजन में गेहूं खेतों में पकने के दौरान अति वर्षा और ओलावृष्टि जैसी प्राकृतिक आपदाएं फसल बर्बाद कर किसानों के मंसूबों पर पानी फेर देती हैं तो खरीफ सीजन में मानसून की दगाबाजी उनके भविष्य के इरादों को चौपट कर देती है। ऐसे किसानों के एक लाख रुपये तक के कर्ज माफ करने की घोषणा की गई, लेकिन तमाम किसानों को महज कुछ रुपये की ही कर्जमाफी के प्रमाण पत्र देकर सिस्टम ने उनकी गरीबी का मजाक बनाने में संकोच नहीं किया।
नलकूपों की खराबी और बिजली संकट से बढ़ा सिंचाई खर्च
जिले की कृषि भूमि को सिंचित करने के लिए छोटी-बड़ी 121 नहरों का जाल बिछा है और विभिन्न तहसीलों में 452 राजकीय नलकूप स्थापित हैं। कई नहरों की लंबे समय से सफाई नहीं होने से वह अनेक स्थानों पर समतल हो गई हैं और उनमें गत कई साल से पानी नहीं आया है। यही नहीं, एक दर्जन से अधिक नहरों में छूटने वाला पानी उनके अंतिम छोर तक नहीं पहुंच रहा। ऐसे में सिंचाई के एकमात्र विकल्प बचे सरकारी नलकूपों की हालत भी बिगड़ी रही। दो दर्जन से अधिक नलकूप बिजली और तकनीकी खराबियों से लंबे समय से खराब पड़े हैं। इनमें से बंद पड़े कुछ नलकूपों का मसला जिला सिंचाई बंधु की बैठकों में कई बार उठा, लेकिन उन्हें सुधारा नहीं जा सका। नतीजे में निजी नलकूपों का सहारा लिए जाने पर सिंचाई मद में खर्च बढने से कृषि से आय दोगुनी होने का सपना चूर-चूर हो गया।
दलहन रकबा नहीं बढ़ा सकी कृषि विकास योजना
केंद्र की मोदी सरकार के पहले कार्यकाल मेें अरहर और उड़द दाल के आसमान छूते दाम नियंत्रित करने को योगी सरकार ने राष्ट्रीय कृषि विकास योजना से दलहन उत्पादन को बढ़ावा देने की घोषणा की, जोकि समय की कसौटी पर खोखली साबित हुई। एक दशक पहले तक जिले में दलहन का रकबा लगभग 45000 हेक्टेयर था, जो अब घटकर सिर्फ 35-36 हजार हेक्टेयर रह गया है। विगत वर्षों की तुलना मेें बीते वर्ष दलहन का रकबा थोड़ा बढ़ा, लेकिन बाद में हुई झमाझम बारिश और बाढ़ के कहर से करीब 13000 हेक्टेयर दलहनी फसलें खराब हो गईं। कृषि वैज्ञानिक डॉ. केएम सिंह का मानना है कि दलहनी फसलों को आवारा पशुओं समेत अन्य अवांछित तत्वों से बचाए रखना कठिन होता है।
सम्मान निधि पाने को भटक रहे तमाम किसान
विधानसभा चुनाव जीतने को केंद्र सरकार ने किसान सम्मान निधि योजना लांच की, लेकिन आचार संहिता लागू होने से पहले सिर्फ 97 हजार किसानों के खातों में चार माह की सम्मान निधि के तौर पर दो-दो हजार रुपये पहुंच सके, जबकि योजना की पात्रता श्रेणी में 2.68 लाख किसान चिह्नित किए गए थे। यही नहीं, विभिन्न शर्तों के कारण 19 हजार लघु सीमांत किसान योजना के दायरे से बाहर रहे और तमाम पात्र किसान निधि पाने के लिए अभी तक कृषि कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं।