एक तो तुगलकी आदेश, वह भी समय पर जारी नहीं होने से अच्छी-भली योजनाओं को कैसे चौपट कर देता है, इसका नमूना शासन का वह आदेश है, जिसमें 21 मई से 30 जून तक (ग्रीष्मावकाश में) छात्र-छात्राओं को मध्यान्ह भोजन यानी मिड-डे-मील खिलाने को कहा गया गया है। इसके लिए मध्यान्ह भोजन प्राधिकरण की निदेशक द्वारा 20 मई को जारी किया गया आदेश 21 मई को यहां पहुंचा। तब तक जिले भर की शिक्षण संस्थाएं परंपरागत ढंग से 20 मई को बंद हो चुकी थीं। अब 20 मई के बाद पहुंचे आदेश को लागू करा पाना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। विभाग की ओर से इस फरमान संबंधी जानकारी 22 मई को शिक्षण संस्थाओं को दी गई। अब इसे लागू करने में एक नहीं कई पेंच ऐसे फंस रहे हैं, जिनको दूर करने में ही हफ्ते गुजर जाएंगे।
सबसे पहले यहां इस बात पर गौर करना जरूरी है कि शासन और विभाग स्तर से सभी शिक्षण संस्थाएं 20 मई को ही ग्रीष्मावकाश में बंद होती हैं। स्कूल-कॉलेज बंद होने से पहले गैर जनपदों में रहने वाले तमाम शिक्षक अपने घर जाने के लिए बहुत पहले ही रिजर्वेशन करा लेते हैं और 20 मई को स्कूल बंद होते ही चले भी जाते हैं, वहीं अधिकांश बच्चे भी नाते-रिश्तेदारी में छुट्टियां मनाने चले जाते हैं। शासन भी इस बात को अच्छी तरह जानता है कि 20 मई को शिक्षण संस्थाएं बंद हो जाती हैं, बावजूद इसके ग्रीष्मावकाश में एमडीएम बनवाने का आदेश निकालने में विलंब किया गया।
छुट्टियों के बाद एमडीएम खाने वाले बच्चों की सूचना लेने को जब गुरुजनों के मोबाइल घनघनाए, तो उन्होंने सीधे जीरो बटन दबाने में ही बुद्धिमानी समझी। कम से कम माध्यमिक कॉलेजों में तो शत प्रतिशत जीरो बटन ही दबाए गए और यह सिलसिला अभी जारी भी रह सकता है। इसका कारण यह है कि जब स्कूलों में बच्चे ही नहीं हैं तो मिडडे-मील किसके लिए बनाया जाए और बच्चों को सूचना देना इतना आसान भी नहीं है।
इसका कारण यह है कि प्राथमिक स्कूलों में तो एक गांव के ही बच्चे होते हैं, लेकिन इंटर कॉलेजों में पूरे शहर और कुछ गांवों के बच्चे शामिल होते हैं। इन बच्चों की संख्या भी सैकड़ों में होेती है। मसलन कहीं 500 तो कहीं 700 या फिर इससे भी अधिक या कम। अब इतने बच्चों को मोबाइल फोन से सूचना देना कोई आसान काम नहीं है। प्रधानाचार्यों का कहना है कि पढ़ाई की मजबूरी में तो बच्चे स्कूलों में जैसे-तैसे आते हैं, केवल खाना खाने के लिए वह इतनी दूर से स्कूल बिल्कुल ही नहीं आएंगे।
प्रधानाचार्य बोले, ऐसे तो फर्जीवाड़ा बढ़ेगा
ग्रीष्मावकाश में छात्र-छात्राओं को एमडीएम खिलवाने पर प्रधानाचार्य बहुत आक्रोशित हैं, उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि बच्चों को किस तरह सूचना दी जाए। सरकार ने व्यवहारिक पक्ष समझा ही नहीं और आदेश जारी कर दिया। जीआईसी के प्रधानाचार्य रणवीर सिंह कहते हैं कि अब केवल फर्जीवाड़ा ही होगा, सरकार भी यही चाहती है। जब बच्चे ही नहीं होंगे तो खाना किसे किसके लिए बनवाया जाएगा। शुक्रवार को ही आर्डर मिला है, इतनी दूर-दूर से बच्चे इस गर्मी में सिर्फ खाना खाने के लिए तो बिल्कुल ही नहीं आएंगे। बच्चों को सूचित करेंगे, आ गए तो खाना बनवा देंगे। श्री दैवी संपद इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. अमीर सिंह कहते हैं कि उनके एमडीएम प्रभारी तो गाजीपुर के हैं, वह स्कूल बंद होते ही चले गए। कोई एक क्षेत्र के तो बच्चे हैं नहीं कि उन्हें बुलवा लिया जाए, शहर के अलावा गांवों के भी बच्चे हैं, इतने बच्चों सूचित करना आसान काम नहीं है।
इस्लामिया इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य सैयद जुबैर अब्दुल कादिर का कहना है कि कक्षा छह से आठ तक करीब 700 बच्चे हैं, इनको कैसे सूचना दी जाए, कुछ समझ में नहीं आता। बच्चे आएंगे तो खाना बनवा दिया जाएगा। वह फर्जी सूचना देने के पक्ष में बिल्कुल नहीं हैं। फिलहाल सभी प्रधानाचार्यों ने शुक्रवार को भी जीरो वाला बटन दबाकर एमडीएम खाने वाले बच्चों की संख्या शून्य ही प्रदर्शित की है।
‘सरकार के लिए कोई भी आदेश जारी करना आसान है, लेकिन उसे लागू कराना उतना आसान नहीं होता, जितना सरकार समझती है। यदि सरकार को गर्मी की छुट्टियों में एमडीएम बनवाना ही था तो पहले शिक्षकों की छुट्टियां निरस्त करते, फिर स्कूल का अवकाश भी निरस्त करते, जो संभव नहीं है। सरकार का यह आदेश बिल्कुल व्यवहारिक नहीं है और फिर सिर्फ खाना खाने के लिए कई किलोमीटर से बच्चे आएंगे भी नहीं।’
- संतोष पांडेय, प्रांतीय उपाध्यक्ष माध्यमिक शिक्षक संघ (पांडेय गुट)
शिक्षिकाओं को उपस्थित होने के दिए निर्देश
गुरु नानक पाठशाला कन्या जूनियर हाई स्कूल की प्रधानाचार्य हरमीत कौर ने सभी शिक्षिकाओं को शनिवार को सुबह आठ बजे स्कूल में उपस्थित होने के निर्देश दे दिए हैं। ताकि बच्चों के लिए भोजन की व्यवस्था की जा सके।