जिंदगी तरह-तरह की मजबूरियों के बहाने इम्तहान लेती है, लेकिन खुद्दारी का जज्बा हर इंसान को जीवन के झंझावातों से ऊपर उठने का रास्ता दिखा देता है। शहर के मोहल्ला हुसैनपुरा के रहने वाले सोबरन लाल के बेटे महेंद्र इसकी मिसाल हैं। रिक्शा चलाकर परिवार की गाड़ी खींचते थे, लेकिन ट्रेन एक्सीडेंट में दोनों पैर कट जाने से आजीविका छिनी तो ट्राई साइकिल को रोजी-रोटी का साधन बना लिया। बीमा क्लेम पाने के लिए वह कलक्ट्रेट पर हाकिमों की चौखट पर घिसटते पहुंचे तो उनकी जिंदगी में झांकने का मौका मिला।
अपनी बूढ़ी मां के साथ अफसरों के पास गुहार लगाने पहुंचे महेंद्र के परिवार की गाड़ी सात साल पहले तक सुकून से चल रही थी। रिक्शा चलाकर माता-पिता समेत पत्नी कामिनी समेत बेटे-बेटी का भरण-पोषण कर रहे थे कि एक दिन ट्रेन के चक्के उन पर कहर बनकर टूट गए। जान बच गई, लेकिन पैर कट जाने से जिंदगी शरीर के लिए बोझ बन गई। महेंद्र के मुताबिक बीवी-बच्चे नहीं होते तो जिंदगी से मोह भी नहीं रहता।
मुश्किल हालातों में उनकी वृद्ध मां ने घरों में चौका-बर्तन सफाई करके परिवार को पालने का जिम्मा उठाया। समय ने मरहम लगाया तो दुर्घटना के संताप से ऊपर उठकर महेंद्र ने भी सक्रिय होने की ठानी क्योंकि बेटा वासुदेव 11 साल का और बेटी पल्लवी नौ साल की हो चुकी है। महेंद्र ने बताया कि एक संस्था से मिली ट्राई साइकिल के सहारे कभी-कभार अखबार बेच लेते हैं। बाकी 1800 रुपये छमाही विकलांग पेंशन का सहारा है।
अफसरों के पास आने का सबब पूछने पर महेंद्र ने मु_ी में मुड़े-तुड़े बीमा पालिसी के कागजात आगे बढ़ा दिए। उन्हें देखने से पता चला कि एलआईसी के जियाखेल स्थित कार्यालय से ली गई पॉलिसी पर 800 रुपये तिमाही किश्त जाती है और महेंद्र अब तक 6200 रुपये जमा कर चुके हैं। बीमा पालिसी की रकम लगातार तीन साल तक किश्तें जमा होने पर ही वापस किए जाने का प्रावधान है और इसी आधार पर महेंद्र को बीमा कार्यालय से भुगतान किए बगैर लौटा दिया गया। चूंकि, अफसर जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव की तैयारियों में व्यस्त रहे। इसलिए महेंद्र ने दोबारा आने की बात कही और हथेलियां जमीन पर टिकाकर घर की ओर रेंग चले।