शहर के राजकीय पॉलीटेक्निक (जीटीआई) का हाल बदहाल होता जा रहा है। यहां दिनों दिन लेक्चरर्स (व्याख्याता) की संख्या घटती जा रही है। बचे हुए गिने चुने शिक्षकों पर सैकड़ों विद्यार्थियों को भविष्य में इजीनियर्स बनाने का दबाव है। देश के विभिन्न राज्यों से इंजीनियर बनने का सपना लेकर यहां प्रवेश लेने वाले छात्र-छात्राओं का भविष्य ही चौपट हो रहा है।
जलालाबाद मार्ग स्थित राजकीय पॉलिटेक्निक को बनवाने में कांग्रेस के नेता कुंवर जितेंद्र प्रसाद की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जीटीआई में इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग, मैकेनिकल इंजीनियरिंग, सिविल इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग, कैमिकल इंजीनियरिंग और कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग की ब्रांच हैं। इन ब्रांच के लिए करीब 35 व्याख्याताओं के पद स्वीकृत हैं, जिनके सापेक्ष वर्तमान में मात्र पांच लेक्चरर ही कार्यरत हैं। अब अंदाजा लगाया जा सकता है कि छात्र-छात्राओं को 35 के सापेक्ष मात्र पांच व्याख्याता किस तरह प्रशिक्षित कर रहे होंगे। युवाओं को इंजीनियर बनाने के लिए उनके ऊपर कितना दारोमदार होगा।
शहर के जीटीआई की ही बात क्यों की जाए, इसी भवन में संचालित पुवायां जीटीआई का हाल भी बद से बदतर है। यहां इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग, मैकेनिकल ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग की ब्रांच स्वीकृत है। इन ट्रेडों के लिए मात्र दो व्याख्याता ही तैनात हैं। यानी लगभग एक हजार विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए सात लेक्चरर अपनी सेवाएं जैसे-तैसे पूरी कर रहे हैं। शिक्षकों की इस कमी को दूर करने के लिए जीटीआई में 19 अतिथि व्याख्याओं की नियुक्ति की गई। अतिथि व्याख्याताओं को तीन सौ रुपये प्रति घंटा और अधिकतम 12 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय तय है। इतने कम मानदेय पर गर्दिश के दिन काट रहे अतिथि शिक्षकों की दशा तब और खराब हो रही है, जब उन्हें पिछले दो साल से कोई मानदेय दिया ही नहीं गया है। यानी बिना पैसे के इंजीनियर बनाने का दायित्व निभा रहे हैं अतिथि व्याखाता। इसके अलावा स्टाफ भी आधा-अधूरा ही जीटीआई में अपने कामकाज को अंजाम दे रहा है। ऐसे में शिक्षा की गुणवत्ता की बात करना कितनी जायज है, यह समझी जा सकती है।
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संस्थान में व्याख्याताओं की भारी कमी है। इस कमी को दूर करने और अतिथि व्याख्याताओं के मानदेय की डिमांड कम से कम दस बार की जा चुकी है। व्याख्याताओं की कमी के बावजूद जो स्टाफ पास में है, उनका पूरा सहयोग लिया जा रहा है, ताकि छात्र-छात्राओं का अहित न हो।
- राजन सिंह, प्रधानाचार्य राजकीय पॉलीटेक्निक