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किसान, कृषि कानून और ध्रुवीकरण का रहा असर

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शाहजहांपुर/पुवायां। जिले में कृषि कानूनों के खिलाफ चले आंदोलन के बाद बने माहौल का चुनाव में बड़ा असर रहा। तमाम बड़े सिख किसान भाजपा के पक्ष में नहीं आ सके। जिन्ना को लेकर हुई बयानबाजी से हुए ध्रवीकरण और बसपा के कमजोर होने से भी सपा को फायदा रहा। महंगाई को लेकर ज्यादा असर नहीं दिखा।
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कृषि कानूनों के खिलाफ हुए आंदोलन में शाहजहांपुर के किसानों की बड़ी भूमिका रही थी। खासकर इसका असर पुवायां तहसील में ज्यादा रहा था। मिनी पंजाब के नाम से जाने वाले पुवायां में सिक्ख किसान बड़ी तादात में हैं। ये किसान काफी संपन्न होने के कारण चुनाव को प्रभावित करने का पूरा माद्दा रखते हैं। कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन में पुवायां, खुटार और बंडा के तमाम किसानों ने भाग लिया था और वहां से केंद्र सरकार के खिलाफ जो माहौल बना था, वह चुनाव में भी बरकरार रहा। इस कारण पुवायां क्षेत्र से लेकर जिले भर में सिख किसानों का वोट भाजपा केे पक्ष में काफी कम गया। छोटे किसान प्रधानमंत्री सम्मान निधि को अच्छा बताते हुए भाजपा के खेमे में दिखे।
जिन्ना को लेकर बयानबाजी और राम मंदिर के बाद मथुरा को लेकर दिए गए बयानों से जिले में ध्रुवीकरण देखने को मिला। बसपा की कमजोर स्थित को देखते हुए मुस्लिम मतदाताओं ने सपा की झोली भरने में कसर नहीं छोड़ी, वहीं भाजपा को इस बार बसपा के परंपरागत वोट बैंक जाटव बिरादरी का साथ मिलने से किसानों की नाराजगी की भारपाई होती दिख रही है।
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चुनाव से कुछ समय पहले डीजल और पेट्रोल के दाम घटने से महंगाई का फैक्टर कमजोर पड़ गया। चुनाव के दौरान पेट्रोलियम पदार्थों के दाम नहीं बढ़ना भी महंगाई के मुद्दे को दबाने में कामयाब रहा। इससे भाजपा को लाभ पहुंचा। गुंडों को यूपी से भगा देने और माफिया पर बुलडोजर की बयानबाजी भी गैर मुस्लिम वोटरों को जोड़ने में कामयाब रही। लोगों को हर माह दो बार मिल रहा राशन भी चुनाव में प्रभावी मुद्दा रहा। यही कारण रहा कि तमाम ऐसे लोगों ने भी भाजपा के पक्ष में वोट दिए जो दूसरी पार्टियों के समर्थक थे। कई जगह तो नमक खाकर नमक हलाली करने की बात भी चर्चा में रही। वहीं लड़की हूं, लड़ सकती हूं का नारा भी कांग्रेस में जान नहीं फूंक सका। बसपा के बड़े नेताओं के नहीं आने से भी अलग संदेश गया और बसपा का वोटर भाजपा के पक्ष में चला गया।
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