‘न जीने की तमन्ना है न कुछ करने की ख्वाहिश, बस वतन की खातिर सर कटाने के लिए रोशन हैं’
जनपद मुख्यालय से 65 किमी दूर ब्लाक खुदागंज के गांव नवादा दरोवस्त में ठा. जंगी सिंह के पुत्र रोशन सिंह बचपन से ही क्रांतिकारी भावना से लवरेज थे। गुलामी की जंजीरों में जकड़ा देश आजादी के लिए अपने सपूतों का लहू मांग रहा था। बरतानिया हुकूमत से मुक्ति पाने के लिए हर कोई छटपटा रहा था। काकोरी कांड के महानायक अमर शहीद ठा. रोशन सिंह का जन्म 22 जनवरी 1892 (आज के ही दिन) को नवादा दरोवस्त गांव में हुआ था। यह वही गांव है, जहां प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर आला अधिकारी तक यहां पहुंचकर शहीद स्मारक पर सर झुका चुके हैं, लेकिन आज तक इस शहीद के जन्मदिन पर होने वाली घोषणाएं खोखली ही साबित हुई हैं। भला हो जनपद की प्रथम महिला सांसद कृष्णाराज का, जिन्होंने अमर शहीद का कर्ज उतारने के लिए या यूं कहें कि उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए इस गांव को सांसद आदर्श ग्राम योजना के अंतर्गत गोद लिया है। गांव वालों को एकबार फिर उम्मीद जागी है कि अब नवादा दरोवस्त की काया जरूर पलट जाएगी। जिलाधिकारी शुभ्रा सक्सेना भी इस गांव के विकास के लिये विशेष रुचि ले रही हैं।
गांव नवादा दरोवस्त शहीद का पैतृक गांव होने का दर्जा होने के बाद भी विकास की किरण से कोसों दूर है। गांव के ऊबड़-खाबड़ रास्ते, गंदगी से पटी नालियां, कच्चे मकानों में सिसकती जिंदगी, खेल कूद के लिये तरस रहे नौनिहाल, उच्च शिक्षा के लिये घरों में कैद होकर रहने वाली बालिकाएं, यह सब बदहाली की दास्तान है। शहीद रोशन सिंह की आदमकद प्रतिमा का अनावरण 26 मार्च 1991 को देश के पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने किया था। मुख्य चौराहे पर शहीद रोशन सिंह स्मृति द्वार न होने से बाहर से आना वाला व्यक्ति अनायास नहीं जान पाता है कि यह कस्बा शहीद रोशन सिंह का पैतृक नगर है। शहीद रोशन सिंंह के जन्मदिन को लेकर कोई प्रशासनिक योजना नहीं है। एसडीएम पदम सिंह ने कहा कि वह शहीद के स्मारक पर माल्यार्पण करने आएंगे।