शाहजहांपुर/परौर। क्रांतिकारियों की सरजमीं पर जन्मे प्रदेश के प्रथम परमवीर चक्र विजेता नायक जदुनाथ सिंह की शहादत को आज 72 साल पूरे हो गए। देश को आजादी मिले भी इतना ही वक्त बीत चुका है। तब से केंद्र और प्रदेश में तमाम सरकारें आईं और चली गईं। जमाना बदल गया, लेकिन शहीद के घरवालों और उनकी जन्म भूमि खजुरी गांव का नसीब नहीं बदल सका। परिवार की तीसरी पीढ़ी के लोग आज भी सरकारी योजनाओं के लाभ से कोसों दूर तंगहाली और गुमनामी मेें जीने को अभिशप्त हैं। तीन साल पहले जिले की तत्कालीन सांसद एवं केंद्रीय राज्यमंत्री कृष्णाराज ने सांसद आदर्श ग्राम योजना में खजुरी गांव गोद लिया, लेकिन शहीद के परिवार और गांव के हालात नहीं सुधर सके।
कलान तहसील मुख्यालय से 16 किमी दूर 12 हजार की आबादी वाले गांव खजुरी में 19 नवंबर 1916 को वीरबल सिंह की पत्नी जमुना देवी की कोख से जदुनाथ सिंह जन्मे थे। उनके पिता वीरबल सिंह मूलत: एटा जनपद के गांव बरही के रहने वाले थे, लेकिन बाद में रिश्तेदारी में खजुरी आकर बसे और खेती-किसानी में रम गए। जदुनाथ सिंह सात भाइयों भाय सिंह, सेठ सिंह, अमोल सिंह, भूमिराज सिंह, अतिराज सिंह और शिशुपाल सिंह के बीच तीसरे नंबर के थे। उनके परिवार में इस पीढ़ी से अतिराज की पत्नी रामवती और शिशुपाल की पत्नी गुन्ना देवी अभी जीवित हैं। संयोग है कि शहीद के परिवार की तीसरी पीढ़ी में उनके भतीजे भी सात हैं।
पहलवानी के शौक ने कराया परमवीरता का प्रदर्शन
परिवार के सदस्य बताते हैं कि जदुनाथ सिंह कम पढ़े-लिखे थे, लेकिन गंगा मइया और हनुमान जी के परम भक्त थे। साथ ही पहलवानी के शौक से सेहतमंद भी थे। 1941 में पूर्णमासी पर गंगा स्नान को घटिया घाट गए तो फतेहगढ़ पुलिस छावनी में चल रही भर्ती में शामिल हो गए। सेना की राजपूत रेजीमेंट की 31वीं बटालियन में उनका चयन हुआ और कुछ समय बाद ही अदम्य शौर्य के बल पर उन्हें नायक की पदोन्नती मिल गई। उन्हें जम्मू कश्मीर के नौशेरा सेक्टर की तंगधार चौकी पर नौ सिपाहियों की कमान मिली थी। छह फरवरी 1948 को पांच सौ सैनिकों की दुश्मन फौज के दो आक्रमणों का नायक जदुनाथ ने दिलेरी से सामना किया और बाद में तोपची की ब्रेनगन लेकर खुद बंकर से बाहर आ गए। वह दुश्मन की गोलियों से छलनी हो गए, लेकिन अंतिम समय तक डटकर मुकाबला कर कई सैनिक मार गिराए। इसी अदम्य दिलेरी और शौर्य प्रदर्शन के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उन्हेें वर्ष 1955 में मरणोपरान्त परमवीर चक्र प्रदान किया।
परिवार के लिए अमूल्य धरोहर बना मेडल और प्रमाण पत्र
परमवीर चक्र के प्रतीक के रूप में नायक जदुनाथ सिंह के पिता वीरबल सिंह को राष्ट्रपति से गोल्ड मेडल और प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ था। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से हस्तलिखित संदेश और जनरल केएम करियप्पा से भी प्रमाण पत्र मिले। वीरबल के निधन के बाद मेडल उनके भाई भाय सिंह और उनकी मौत होने पर छोटे भाई अमोल सिंह के पास आया। वर्तमान में उनके नाती रामसेवक के पास मेडल उनकी अमूल्य धरोहर के तौर पर सुरक्षित है। इसी तरह नायक के भतीजे नेत्रपाल उनके प्रमाण पत्र समेत अन्य यादें कलेजे से लगाए हैं। नायक जदुनाथ सिंह अविवाहित थे, इसलिए उनके भाइयों को शहीद परिवार के नाते कोई लाभ नहीं मिले। हालांकि, जदुनाथ के भाई भूमिराज के बेटे मुनेंद्र को वर्ष 2005 में एक इंदिरा आवास मिला था जो अब जर्जर हो चुका है। परिवार के अन्य सदस्य आवास के अभाव में झोंपड़ी डालकर गुजारा कर रहे हैं। चुनाव के दौरान 5500 वोटों के लालच में नेता शहीद की जन्म भूमि की धूल फांकने आते हैं, लेकिन खजुरी में नायक जदुनाथ की प्रतिमा लगाने के अलावा विकास का ऐसा कोई काम नहीं हो सका, जिसे शहीद के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक माना जा सके।
शहीद की संवारी प्रतिमा, हेलीपैड बनकर तैयार
नायक जदुनाथ सिंह के बलिदान दिवस पर आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम के लिए खजुरी में पहले से स्थापित उनकी प्तिमा को सेना के अधिकारियों की देखरेख में सजाया-संवारा गया है। कार्यक्रम में चीफ ऑफ डिफेंस जनरल विपिन रावत के आगमन को लेकर अभी संशय बना हुआ है, लेकिन गांव के किनारे मैदान को समतल कर वहां हेलीपैड बनाया जा चुका है। इससे यह तय माना जा रहा है कि सेना और सरकार से जुड़े वीवीआईपी का आगमन होना है। व्यवस्थाओं को अंतिम रूप देने में जुटे राजपूत रेजीमेंट के सूबेदार बृजपाल सिंह ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए यह बताने से इनकार कर दिया कि श्रद्धांजलि कार्यक्रम मेें सेना के कौन-कौन अधिकारी मौजूद रहेंगे। प्रतिमा स्थल के आसपास सफाई कर वहां ऐसा पंडाल बनाने की तैयारी की जा रही है, जिसमें 200 से 300 लोग बैठ सकें। कलान के एसडीएम रमेश बाबू तैयारियों की निगरानी में जुटे हैं।