निर्वाचन की व्यवस्थाओें में जुटे प्रशासनिक अधिकारियों ने जिले के सभी छह विधानसभा क्षेत्रों में कुल 287 बूथ ऐसे चिन्हित किए हैं, जहां वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में 50 फीसदी से कम वोट पड़ सके थे। इनमें से कुछ बूथ तो ऐसे हैं जिन पर 29 फीसदी से भी कम मतदान हुआ। ऐसे सभी बूथों पर मतदान प्रतिशत बढ़ाने की चुनौती का सामना कर रहे अफसरोें ने टीमें बनाकर कम मतदान होने के कारण तलाशने शुरू कर दिए हैं ताकि इस बार इन बूथों पर अधिकतम लोग वोट डाल सकें। बता दें कि वर्ष 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में जिले की सभी छह सीटों पर कुल 64.89 प्रतिशत लोगों ने मताधिकार का इस्तेमाल किया था, लेकिन दो साल बाद वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में जिले का मतदान प्रतिशत घटकर 57.02 प्रतिशत रह गया। इस बार भारत निर्वाचन आयोग ने मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए नो वोटर टु बी लेफ्ट बिहाइंड का नारा देते हुए कोई भी मतदाता वोट डालने से वंचित न रखने का संकल्प किया है। इसके लिए आयोग ने स्वीप योजना के तहत मतदाता जागरूकता अभियान चलाया है। इस अभियान के तहत प्रशासन ने भी जिले में 85 प्रतिशत तक मतदान कराने का लक्ष्य तय करके उसी के अनुरूप विभिन्न स्तरों पर विविध कार्यक्रम शुरू करा दिए हैं। इसकेे साथ ही प्रशासन, विशेषकर निर्वाचन से जुड़े अधिकारी इस बात की तह तक जाने की कोशिश में जुटे हैं कि विधानसभा के सापेक्ष लोकसभा के चुनाव में 7.87 प्रतिशत मतदान कम क्यों हुआ? अफसरों ने छानबीन करने पर सभी छह सीटों पर 50 प्रतिशत से कम मतदान वाले 287 बूथ खोज निकाले हैं। इनमें सर्वाधिक 71 बूथ नगर विधानसभा क्षेत्र में पाए गए हैं, जबकि अभी तक माना जाता रहा है कि शहरी क्षेत्र के ज्यादातर मतदाता शिक्षित होने के कारण लोकतंत्र मेें मताधिकार का महत्व ग्रामीण क्षेत्र के अनपढ़ और अल्प शिक्षित लोगों से कहीं अधिक बेहतर समझते हैं। इसी तरह कटरा विधानसभा क्षेत्र में 53, जलालाबाद में 48, तिलहर में 42, पुवायां में 37 और ददरौल विधानसभा क्षेत्र मेें 36 बूथ न्यूनतम मतदान वाले चिन्हित किए गए हैं। जिला निर्वाचन अधिकारी राम गणेश ने बताया कि वलभनरेबिल और क्रिटिकल श्रेणी के बूथों की जांच पड़ताल से यह तथ्य सामने आया कि 287 बूथों पर 50 प्रतिशत से कम वोट पड़े। डीएम ने इन बूथों पर मतदान घटने के कई संभावित कारण गिनाते हुए कहा कि हो सकता है कि इन बूथों पर कहीं पर प्रत्याशी विशेष के पक्ष में स्थानीय दबंगों की मनाही का असर रहा हो अथवा बूथों की भौगोलिक स्थिति ऐसी रही हो, जहां तक पहुंचना सभी मतदाताओं के लिए सुविधाजनक नहीं रहा हो। यह भी संभव है कि स्थानीय समस्याओं की लंबे समय से होती चली आ रही उपेक्षा से खिन्न होकर लोग मतदान से उदासीन रहे होें। डीएम के निर्देश पर अधिकारियों की टीमें संबंधित बूथों का जायजा लेने के साथ वहां के मतदाताओं को भी टटोलने में जुट गए हैं।