शाहजहांपुर। चलती ट्रेन से धक्का देकर मोबाइल चोरी के आरोपी को गिराने के मामले में अब बड़ा रहस्य यह है कि वह कौन था? अंतिम संस्कार होने के बाद पुलिस के सामने यह बड़ी चुनौती होगी। अदालत ने कहा कि इस निर्णय के बाद जीआरपी को यह इस तथ्य की जांच जरूर करनी चाहिए कि मरने वाला व्यक्ति कौन था। वहीं, परिजनों ने ट्रेन से गिरे व्यक्ति की पहचान हड़बड़ी में कर ली थी और छह महीने तक उसे मृत मानते रहे।
अदालत ने अपने निर्णय में यह भी कहा है कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि नरेंद्र कुमार दुबे ने उस व्यक्ति को ट्रेन से धकेल दिया था और उसकी मृत्यु हो गई थी। उसकी मृत्यु का कारण निश्चित रूप से नरेंद्र कुमार दुबे है। इस न्यायालय द्वारा अभियुक्त के खिलाफ उस अज्ञात व्यक्ति के संबंध में कोई निर्णय नहीं लिया जा रहा है।
न्यायालय द्वारा मात्र यह निर्णय लिया जा रहा है कि जिस व्यक्ति के लिए यह कहा जाता है कि वह अभियुक्त द्वारा ट्रेन से धकेलकर मारा गया, वह व्यक्ति मोहम्मद ऐताब है और उसने स्वयं न्यायालय में उपस्थित होकर अपना बयान भी दिया है। वर्तमान मामले में जीआरपी के विवेचक को भी दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि मृतक की शिनाख्त उसके पिता मोहम्मद याकूब, उसके बहनोई सोहराब, मौसा नसीर, सोहराब के चाचा याकूब ने की थी।
जब घर वाले ही अपने घर के सदस्य को नहीं पहचान सके तो ऐसी स्थिति में पुलिस को दोष देना बिलकुल ही गलत होगा। ऐसे में माना जा रहा है कि नरेंद्र की मुश्किल अदालत के निर्णय के बाद भी पूरी तरह से खत्म नहीं होंगी। अगर जीआरपी मामले की फिर से जांच करती है और शव की शिनाख्त हो जाती है तो उसे दोबारा से अदालती कार्यवाही का सामना करना पड़ेगा।
पत्नी ने कर ली दूसरी शादी
मोहम्मद ऐताब की मौत की जानकारी होने के बाद छह महीने तक परिजन उसे मृत मानते रहे। एडीजीसी श्रीपाल वर्मा ने बताया कि ऐताब की बीवी और दो बच्चे थे। शौहर को मृत मानकर उसकी बीवी ने दूसरी शादी कर ली थी। जब ऐताब घर पहुंचा तो उसे इसकी जानकारी हुई। बाद में ऐताब ने भी दूसरी शादी कर ली। वर्तमान में वह बिहार के वैशाली स्थित अपनी ससुराल में रह रहा है।
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हड़बड़ाहट में कर ली पहचान
जो व्यक्ति चलती ट्रेन से गिरकर मरा था, उसकी शक्ल ऐताब से काफी मिलती थी। यही वजह थी कि परिजन धोखा खा गए थे। जब उसके मोहल्ले के व्यक्ति ने उसके पिता मोहम्मद याकूब को फोटो दिखाई तो शक्ल काफी मिलने की वजह से उन्हें लगा कि वह उनका बेटा ही है। रोते-बिलखते वे लोग किसी तरह जिला अस्पताल आए। शवगृह में शव को देखकर अपना बेटा मान लिया। उनके साथ कई परिजन भी थे लेकिन वे लोग भी पूरी तरह से पहचान नहीं कर पाए। शव को बिहार ले जाने की जगह शाहजहांपुर में ही बड़ी ईदगाह स्थित कब्रिस्तान में सुपुर्दे खाक कर दिया था। इसमें स्थानीय लोगों ने भी मदद की थी। अदालत में भी परिजनों ने माना था कि हड़बड़ाहट और जल्दबाजी में उन्होंने गलत पहचान कर ली थी।
परिजनों ने साधी चुप्पी
नरेंद्र के निर्दोष साबित होने के बाद उनके परिजनों ने चुप्पी साधी ली। जिला कारागार से नरेंद्र की रिहाई के लिए उनकी मां मीना दुबे के अलावा अन्य परिजन बाहर बैठकर इंतजार करते रहे। बुधवार रात को उसकी रिहाई हुई। नरेंद्र मूलरूप से फैजाबाद की तहसील बीकापुर के गांव खेमासराय का रहने वाला है। उसकी दो बहनें हैं। साथ आए परिजनों ने मामले के संबंध में कुछ भी बोलने से इन्कार कर दिया।