शाहजहांपुर। देश में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा हिंदी है। हिंदी का दिल इतना विशाल है कि वह अपने अंदर तमाम भाषाओं को समेट सकती है। बावजूद इसके हिंदी को आज तक उसका सम्मान नहीं मिला। यदि कोई किसी बड़े आयोजन में अंग्रेजी बोलता है, तो उसे अधिक विद्वान माना जाता है। ऐसा नहीं होना चाहिए। आज हिंदी को दोयम दर्जे से बाहर निकालने की आवश्यकता है। लोगों को अपनी सोच बदलनी होगी और सार्वजनिक क्षेत्रों में हिंदी बोलने में संकोच छोड़ना होगा। अंग्रेजी के प्रति मोह और अपनी मातृ भाषा के प्रति उपेक्षित भाव त्यागना होगा, तभी हमारी राष्ट्रभाषा समृद्ध हो सकती है।
हिंदी अपनाए बिना तरक्की नहीं, लोगों में आ रहा बदलाव
जो लोग लगभग बीस साल पहले हिंदी को बोलने में संकोच करते थे और हीनभावना महसूस कर रहे थे, वह आज हिंदी बोलने में गर्व महसूस कर रहे है, यह हिंदी की ताकत ही है, जो लोगों में बदलाव ला रही है। हमारी हिंदी कमजोर कभी नहीं रही, हां इतना जरूर है कि इसे समझने में लोगों ने भूल जरूर की, जिसका सुधार अब हो रहा है और दिखाई भी दे रहा है। जब पूरा विश्व आज हिंदी की महत्ता को स्वीकार कर रहा है, तो अपने देश के लोग संकुचित क्यों हो रहे हैं, यह बात समझ में नहीं आ रही है। आज पूरे विश्व की समझ में आ गया है कि हिंदी को अपनाए बिना कोई तरक्की नहीं कर सकता। हमारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी राष्ट्रभाषा के उत्थान की बात की गई है।
- दिनेश रस्तोगी, पूर्व प्रधानाचार्य एवं हास्य कवि
अंग्रेजी में ही पूरा ज्ञान छिपा, यह सोच गलत
हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी के साथ हमेशा से ही भेदभाव होता आया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारी राजभाषा अंग्रेजी नहीं है, फिर भी लोग हिंदी को उपेक्षित कर अंग्रेजियत की ओर भाग रहे हैं, जो नहीं होना चाहिए। इसमें सबसे अधिक प्रबुद्ध वर्ग ने ही भाषा के नाम पर भेद किया है और लोगों को भेद के लिए प्रोत्साहित भी किया है। लोगों का यह सोचना कि अंग्रेजी में ही पूरा ज्ञान छिपा है, यह गलत है और इस प्रकार की सोच संकुचित भी है। भारतीयों को अंग्रेजी के प्रति निर्भरता नहीं होनी चाहिए। हम अंग्रेजी को भी पढ़ें, लेकिन अपनी राष्ट्रभाषा को अपमानित न होने दें। हिंदी को भी उतना ही महत्व और सम्मान मिलना चाहिए, जितना अंग्रेजी अथवा अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को दिया जा रहा है।
- बीएल मौर्या, प्रवक्ता जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान