मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सख्ती से गोवंश की तस्करी और मांस बेचने वालों के होश फाख्ता हैं। प्रशासन भी अवैध रूप से हो रहे इस कारोबार से जुड़े लोगों पर नकेल कसता नजर आ रहा है। राजमार्ग पर वाहनों से बरामद होने वाले गोवंशीय पशुओं को संरक्षण देने के लिए पुलिस को गोशाला विनोबा सेवा आश्रम ही नजर आती है लेकिन यहां गायों को न तो भरपेट चारा मिल रहा है और न ही बीमार होने पर उनके इलाज की व्यवस्था है।
रोजा क्षेत्र में संत विनोबा भावे की प्रेरणा से रमेश भइया और विमला बहन ने 1996 में बरतारा में गोशाला की स्थापना की थी, तब उन्होंने 11 गायों से इसकी शुरुआत की। करीब दो एकड़ जमीन में फैली गोशाला में पशुओं के चारा की व्यवस्था के लिए करीब चार एकड़ जमीन राजस्व विभाग से आश्रम को दी गई है। आश्रम में पल रहीं गायें संसाधनों के अभाव में तड़प-तड़पकर दम तोड़ रही हैं। उनके इलाज की कोई व्यवस्था नहीं है। गायों को सूखा चारा दिया जाता है। गायों को देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन्हें पौष्टिक आहार शायद ही कभी मिलता हो। यही कारण है कि वर्तमान में लगभग 150 गायें, बैल, बछड़े गोशाला में अपने जीवन के अंतिम दिन गिन रहे रहे हैं।
समाजसेवा के लिए देश-विदेश में पहचान बना चुके विनोबा आश्रम के संस्थापक रमेश भइया और सचिव विमला बहन भी संसाधनों के लिए शासन-प्रशासन को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। विनोबा सेवा आश्रम में तमाम एनजीओ संचालित हो रहे हैं। शासन-प्रशासन के अधिकारी भी आश्रम का दौरा करते रहते हैं, लेकिन शायद ही कभी किसी ने गोशाला की ओर ध्यान दिया हो।
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फोटो- 15 में
वर्मी कंपोस्ट प्रोजेक्ट है आमदनी का जरिया
गोशाला को आर्थिक रूप से कोई सरकारी मदद नहीं मिलती है और न ही कोई जनप्रतिनिधि अथवा समाजसेवी किसी प्रकार की मदद देता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि गोशाला के सालाना रख-रखाव में खर्च होने वाला लाखों रुपया आता कहां से है। इस पर सचिव विमला बहन बताती हैं कि गोशाला के लिए तीन एकड़ खेत में चारा पैदा किया जाता है, जबकि दो एकड़ में साल भर के चारे के लिए गेहूं बोया जाता है। तमाम तरीकों से हर साल करीब चार लाख रुपये की आय हो पाती है। वर्धा के एक दानदाता सालाना 50 हजार रुपये देते हैं। अन्य दान से साल में 10 हजार रुपया आ जाता है। गायाें की सेवा के लिए नौ कर्मचारी लगे हैं। उनको भी अल्प पगार ही मिल पाती है। ऐसे में गोशाला चलाना कठिन काम है ।
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बीमार पशुओं के लिए नहीं है कोई डॉक्टर
गुरुवार को अमर उजाला की टीम जब बरतारा के विनोबा सेवा आश्रम गोशाला पहुचीं तो यहां गायों की हालत बदतर थी। करीब एक माह पहले पुलिस ने 41 पशुओं को यहां संरक्षण में दिया था, जिसमें कई मरणासन्न हैं, तो कई बीमार है, जो उठकर बैठ पाने की स्थिति में नहीं हैं। उनके इलाज के लिये जमुका के पशु अस्पताल पर निर्भर रहना पड़ता है। गोशाला में इलाज के नाम पर बाहरी हिस्से में अस्पताल के लिए भवन का निर्माण कराया गया। अब वह जर्जर हालत में पहुंच चुका है। यदि यहां पशु चिकित्सक नियुक्त कर दिया जाए तो गोशाला के साथ ही आसपास के लोगों को भी उसका लाभ मिल सकेगा।
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चरागाहों पर कब्जा होने सेे भी उपजी समस्या
गांवों में पशुओं की दुर्दशा के लिये विनोबा सेवा आश्रम की सचिव विमला बहन का कहना है कि गांवों के चारागाहों पर अवैध कब्जा हो रहा है। इसके चलते समस्याएं पैदा हुई हैं। इसके लिये राजस्वकर्मी सीधे उत्तरदायी हैं। उन्होंने योगी सरकार से अनुरोध किया है यदि गायों को संरक्षण देना है। तो गांवों के चारागाहों को कब्जामुक्त कराया जाए।
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रामबाग गोशाला में है ढाई सौ गोवंश
शहर से सटे मिश्रीपुर में रामबाग गोशाला भी है, जिसमें करीब ढाई सौ गाएं, बछड़े और बैल हैं। चूंकि गोशाला प्रबंध समिति के प्रमुख उद्योगपति रामचंद्र सिंघल अध्यक्ष हैं, लिहाजा यहां पशुओं के लिए कोई समस्या नहीं है। इस गोशाला के लिए भी सरकार से कोई अनुदान नहीं मिलता है, लेकिन पशु प्रेेेेेमियों से मिलने वाले दान और फ्लोर मिलों से मिलने वाले दाना-चोकर से काम चल जाता है। समिति से जुडे़े अन्य पदाधिकारी भी आर्थिक रूप से संपन्न हैं। समिति ने तय कर रखा है कि पुलिस द्वारा पकड़े गए गोवंश को गोशाला में शामिल नहीं किया जाएगा। यहां वही गाएं हैं, जो गांव वाले दान में दे जाते हैं।