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मिट्टी की ईंट को फेल करना चाह रहीं विदेशी कंपनियां

Mon, 06 Jul 2015 11:58 PM IST
शाहजहांपुर।
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पर्यावरण क्लीयरेंस की बाध्यता के विरोध में गत 30 जून से भट्ठों का कामकाज ठप कर चुके ईंट निर्माता इस मुद्दे पर शासन की चुप्पी से बेहद नाराज हैं। सोमवार को ईंट निर्माता कल्याण समिति के जिलाध्यक्ष राकेश कपूर और अन्य पदाधिकारियों ने पत्रकारों से वार्ता करते हुए कहा कि विदेशी कंपनियां देश में मिट्टी की ईंटों के निर्माण व्यवसाय को फेल करना चाह रही हैं और उन्हीं के इशारे पर प्रदेश सरकार ने मिट्टी खनन के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के साथ पर्यावरण विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र हासिल करने की बाध्यता थोप दी।
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जिलाध्यक्ष कपूर ने कहा कि ईंट भट्ठा देश का सबसे बड़ा कुटीर उद्योग है। प्रदेश में करीब 18 हजार भट्ठे हैं और एक भट्ठे से शासन को सालाना पांच लाख रुपये राजस्व के साथ कम से कम सौ परिवारों को प्रत्यक्ष रोजगार मिलता है। शासन से रॉयल्टी भुगतान करके दो मीटर गहराई तक मिट्टी खनन की अनुमति है जिससे पर्यावरण को भी कोई नुकसान नहीं होता। जहां मिट्टी की खुदाई होती है, वहां बाद में खेती शुरू होने पर सिंचाई का पानी परोक्ष रूप से भूगर्भ जल स्तर भी बढ़ा देता है।
उन्होंने कहा कि तीन साल पहले सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका की सुनवाई के मद्देनजर प्रदेश सरकार ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के साथ पर्यावरण विभाग से भी अनापत्ति लेने की बाध्यता लागू कर दी, जबकि ईंट-भट्ठा पर्यावरण को काई नुकसान नहीं पहुंचा रहे। वार्ता में शामिल समिति के प्रदेश उपाध्यक्ष कृष्ण कुमार गर्ग ने कहा कि इस संबंध में बीते माह प्रधानमंत्री को ज्ञापन भी भेजा गया, लेकिन सरकार ने कोई सुनवाई नहीं की। मिट्टी खनन के लिए एनओसी देने वाली अथॉरिटी भी इस काम में दो साल लगा देती है। इतने लंबे समय के लिए मिट्टी का विपुल भंडारण व्यवहारिक रूप से संभव नहीं है।
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जिलाध्यक्ष कपूर ने कहा कि राख और सीमेंट से ईंट बनाने वाली कंपनियां सरकार से मिलकर मिट्टी की ईंट फेल करने की साजिश कर रही हैं, जबकि क्ले ब्रिक्स अन्य ईंटों की तुलना में दस गुना लंबे समय तक चलती हैं। समिति के जिला महामंत्री प्रकाश कालानी ने कहा कि पर्यावरण विभाग से एनओसी की बाध्यता वापस नहीं ली गई तो देश में मध्य आय वर्ग के लोग मकान भी नहीं बना पाएंगे क्योंकि कंक्रीट की महंगी बिल्डिंग केवल धनाढ्य लोग बना सकेंगे।
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