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डिब्बों में कैद प्रधानमंत्री की एग्जाम वारियर्स

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शाहजहांपुर। राजकीय होने के नाते जिला पुस्तकालय की जितनी दुर्दशा होने का अनुमान लगाया जा सकता है, वास्तविकता में वह उससे कहीं ज्यादा खराब है। इंटरनेट और ई-बुक्स के दौर में इस पुस्तकालय में हजारों किताबों को अव्यवस्था की दीमक चाट रही है। बेतरतीब अलमारियों में भरी किताबों की कोई नंबरिंग नहीं की गई है और न ही कोई रजिस्टर बना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की किताब एग्जाम वारियर्स भी यहां गत्ते में कैद पड़ी है।
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इंटरनेट के युग में लाइब्रेरी में जाकर किताबें पढ़ने का शौक अब फीका पड़ चुका है। मगर कुछ लोग अब भी राजकीय पुस्तकालय का रुख कर रहे हैं, जिन्हें यहां पहुंचकर सिर्फ निराशा ही हाथ लगती है। इंतजामिया की लापरवाही का आलम यह है कि किताबें अलमारी में बेतरतीब भर दी गई हैं। बकौल पुस्तकालय इंचार्ज यहां करीब 20 हजार किताबें हैं, लेकिन प्रतियोगी परीक्षा अथवा कोई खास किताब नहीं है। जो किताबें हैं भी, उन्हें ढूंढकर निकालना भी बड़ा काम है। क्योंकि एक भी किताब नंबरिंग करके अलमारी में नहीं लगाई गई है और न ही ऐसा कोई रजिस्टर बना है, जिसकी मदद से पाठक वांछित किताब तलाश सके। पुस्तकालय के एक कोने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छात्रों के लिए उपयोगी पुस्तक एग्जाम वॉरियर्स गत्ते के डिब्बे में भरीं रखी हैं। इन किताबों को कॉलेजों में छात्रों के लिए उपलब्ध कराया गया था।
ऊपरी मंजिल को बना दिया गोदाम
पुस्तकालय की ऊपरी मंजिल पुस्तकों का गोदाम बन चुकी है। यहां तमाम किताबें फर्श पर बिखरी पड़ी हैं और एक साइड में बड़ी संख्या में किताबों के बंडलों का अंबार लगा है। ये वह बंडल हैं, जो राजाराम मोहन राय केंद्रीय पुस्तकालय कोलकाता से भेजा जाता है। इन बंडलों से आज तक किताबों को मुक्त नहीं कराया गया और यह भी नहीं जानने की कोशिश की गई कि किताबें हैं कौन सी। फिलहाल पुस्तकालय सुबह आठ से शाम चार बजे तक खोला जरूर जाता है।
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किताबें रखने को अलमारी नहीं
किताबें रखने के लिए पुस्तकालय में अलमारी ही नहीं हैं और न ही रजिस्टर हैं, जिन पर किताबों का इंडेक्स बनाया जा सके। रख-रखाव और अलमारियों की व्यवस्था विशेष कार्याधिकारी लखनऊ की ओर से की जाती है। पुस्तकालय में लगभग 150 सदस्य हैं, लेकिन सर्दियों में पाठकों की संख्या घट गई है। वह अकेले कुछ नहीं कर सकते। व्यवस्था बनाने के लिए असिस्टेंट लाइब्रेरियन और कंप्यूटर ऑपरेटर की बहुत जरूरत है। - राजीव यादव, राजकीय पुस्तकालय प्रभारी
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