शाहजहांपुर। विश्व मिर्गी दिवस आज है। ग्रामीण इलाकों में लोग मिर्गी को भूत-प्रेत का साया मानते हैं, लेकिन यह मानसिक बीमारी है। डॉक्टर के अनुसार, दो से तीन साल तक दवा करने पर उपचार संभव है। इलाज नहीं कराने पर स्थिति गंभीर हो सकती है।
राजकीय मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विभाग में रोजाना ही 70 से 80 मरीज आते हैं। इसमें दस से 12 मिर्गी की समस्या को लेकर आते हैं। मनोचिकित्सक डॉ.अभिनव रस्तोगी ने बताया कि शरीर अकड़ना, झटके आना और अचेतावस्था में जाने की समस्या पर लोग देसी नुख्सों से उपचार करना शुरू कर देते हैं। झाड़-फूंक भी कराते हैं। देसी नुख्सों व झाड़-फूंक के चलते मरीज की स्थिति विकराल हो जाती है। ओपीडी में आने वाले ऐसे मरीजों की जांच कराने के बाद उपचार शुरू करते हैं।
क्या है मिर्गी और क्या हैं सावधानियां
मनोचिकित्सक डॉ.अभिनव रस्तोगी ने बताया कि मिर्गी में वंशानुगत, खून के रास्ते दिमाग में कीड़ा पहुंचने और बुखार के बाद दौरे पड़ने लग जाते हैं। बड़ों की अपेक्षा यह बच्चों में अधिक है। इसे न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर कहते हैं। ऐसे में लाभ होने पर दवा बंद नहीं करें। दौरा पड़ने पर मुंह में पानी नहीं डालें। हाथ-पैर अकड़ने पर सीधा नहीं करें। मुंह से अधिक झाग आने पर बाईं ओर करवट कर लिटा दें।