परशुराम जयंती के उपलक्ष्य में मंदिर प्रांगण स्थित धर्मशाला मेें चल रही श्रीरामकथा में अवधेश मिश्र ने कहा कि भगवान श्रीराम धर्म की प्रतिमूर्ति हैं। धर्मानुसार आचरण ही सच्ची रामभक्ति है। वही सुखों का मूल भी है। श्रीरामचरित मानस के सात कांड श्रीराम भक्ति के सात सोपान हैं।
उन्होंने कहा कि श्रीराम ने सदगुण संपन्न शक्तियों के विघटन को समाप्त कर उन्हें संगठित किया। सदगुरु की कृपा से ही मनुष्य को विषयों से छुटकारा मिल सकता है। उन्होंने श्रीराम और लक्ष्मण को सत्य और समर्पण का प्रतीक बताते हुए कहा कि राजा दशरथ को संतों की कृपा से ही चौथेपन में ऐसे पुत्र मिले और उन्होंने भी संत समाज, धर्म की रक्षा के लिए अपने पुत्रों को भेजने में संकोच नहीं किया। बनवास के दौरान भगवान श्रीराम की पदयात्रा का उद्देश्य समाज के छोटे से छोटे व्यक्ति से साक्षात्कार करना था। उन्होंने कहा कि देश तथा धर्म पर संकट आने पर शस्त्र उठाने में संकोच नहीं करना चाहिए। कथा के अंत में परशुराम मंदिर के महंत सत्यदेव पांडेय ने आरती कर प्रसाद वितरित किया।