बंडा क्षेत्र के खेत में लहलहाती साठा धान की फसल। संवाद
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बंडा। भूजल स्तर को गिरने से बचाने के लिए शासन ने भले ही साठा धान की खेती पर प्रतिबंध लगा दिया हो, क्षेत्र के कई गांवों में लगाया गया साठा धान लहलहाने लगा है। उच्चाधिकारियों को सूचना देने पर भी किसी कर्मचारी ने मौके पर जांच करने की जरूरत नहीं समझी। इस कारण अन्य तमाम किसान भी साठा की पौध तैयार कर रोपाई की तैयारी में जुटे हैं।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार गेहूं कटने के बाद खाली हुए खेतों में खरीफ फसलों की बोआई से पहले लगने वाले साठा धान में पानी की सर्वाधिक खपत होती है। इसलिए सात-आठ वर्ष पूर्व साठा धान के उत्पादन पर शासन ने रोक लगा दी थी। चूंकि, जनपद में एक दशक पहले मिर्जापुर और कलान समेत कई विकास खंड भूजल स्तर गिरने से डार्क जोन श्रेणी में आ चुके हैं। इसलिए जनपद में साठा की रोपाई पर कड़ाई से प्रतिबंध लागू किया गया।
इसके तहत प्रशासन ने राजस्व विभाग के अधिकारियों को मौके पर भेजकर साठा के खेतों में ट्रैक्टर से जोताई कराई। लगभग तीन-चार वर्ष पहले निगोही क्षेत्र के एक गांव में पहुंचे तत्कालीन तहसीलदार सदर ने किसान परिवार की महिलाओं के कड़े विरोध के बावजूद साठा की पौध भी नष्ट करा दी थी। इसके बाद ही किसानों का साठा से मोहभंग हो सका, लेकिन अब फिर साठा धान की खेती होने लगी है।
इस मामले में क्षेत्र के कई किसानाें ने डीएम व एसडीएम समेत अन्य अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन अधिकारी मौके पर कार्रवाई करने के बजाय केवल आश्वासन देते रहे। गांव गुनहा खमरिया के एक किसान ने एक माह पहले से ही साठा की पौध की तैयारी कर ली और बाद में उसकी रोपाई करा दी। किसानों का कहना है कि यदि उसी समय पौध नष्ट कर दी गई होती तो साठा धान की फसल नहीं दिखती।
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साठा धान लगाने से भूजल भंडार का अनावश्यक दोहन होता है और इससे जल संकट हो सकता है। शासन के निर्देशानुसार किसी को साठा धान नहीं लगाने दिया जाएगा। मामले में जानकारी कराकर कार्रवाई की जाएगी।
-धमेंद्र प्रताप सिंह, जिलाधिकारी