नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाने वाले पुलिस कर्मी किन हालातों में रह रहे है इसका नजारा थाने में देखा जा सकता है। रात दिन मेहनत करने के बाद भी दो पल चैन से सोने के लिए पुलिस कर्मियों को जान जोखिम में डालनी पड़ती है। वे जिन आवासों में रह रहे हैं वे इस कदर जर्जर हैं कि कभी भी ढह सकते हैं।
थाने में बने आरक्षी आवासों की गिरताऊ हालत के चलते पुलिस कर्मियों की जान को खतरा बना हुआ है लेकिन कोई इस ओर ध्यान नहीं दे रहा है। हालांकि नई बैरक का निर्माण हो रहा है, लेकिन काम कछुआ गति से चल रहा है। नए आवास बारिश के बाद ही बन कर तैयार हो पाएंगे। जर्जर आवासों में रखा सिपाहियों का सामान भी बारिश में भीगकर खराब हो गया है। कई आवासों में पानी भरा हुआ है। सिपाहियों ने बताया कि रात भर क्षेत्र में रहने के बाद सुबह लौटने पर जर्जर आवास में जाने की हिम्मत ही नहीं होती हैै। कुछ लोग तो कार्यालय में ही कुर्सियों पर सो जाते हैं तो कुछ सिपाही मैस में जमीन पर सोते हैं।
वर्ष 2008 में ढह गई थी बैरक
अगस्त 2008 में बारिश के समय थाने का एक आरक्षी आवास ढह गया था। तब तत्कालीन पैरोकार विजय सिंह और सिपाही सालार बख्श बाल-बाल बचे थे, लेकिन उनका सारा सामान नष्ट हो गया था। थाने के कई कमरे और ऑफिस की छतें टपकने से रिकार्ड संभालने में भी दिक्कत हो रही है।
थानाध्यक्ष का आवास और कार्यालय भी नहीं बना
खुटार थाने में आरक्षी आवास तो बन रहे हैं, लेकिन कार्यालय और थानाध्यक्ष का आवास नहीं बन रहा है, जबकि कार्यालय और एसओ आवास की दशा भी बेहद खराब है। दीवान को असलहे, मुकदमाती माल और रिकार्ड आदि सुरक्षित रखने में दिक्कत का सामना करना पड़ता है।
आरक्षी आवास जर्जर होने से सिपाही परेशान हैं। मैंने नए आवास बना रहे ठेकेदार से जल्द काम पूरा करने को कहा है। ठेकेदार ने दो महीने में काम पूरा करने का भरोसा दिलाया है। कार्यालय की स्थित भी ठीक नहीं है।
- इंद्रकुमार एसओ खुटार