बाबा! दो क्विंटल गेहूं में कैसे चलेगी हम लोगों की जिंदगी? सरकार ने जो राहत राशि देने की बात कही है वह भी लेखपाल ने नहीं दी। अब हम लोग तो भूखे ही मर जाएंगे। ये आखिरी शब्द थे विश्वपाल के। उन्होंने खेतों से गहाई करने के बाद शुक्रवार की शाम अपने बाबा रामबहादुर से कहकर अपनी हताशा और निराशा को उजागर किया था।
उम्र के आखिरी पड़ाव में पहुंच चुके निघोना गांव के रामबहादुर और शिवदेई के लिए विश्वपाल ही बुढ़ापे का सहारा था जो अपने बाबा और दादी के साथ रहकर खेती के साथ-साथ उनकी सेवा किया करता था।
राम बहादुर बताते है कि भावलखेड़ा ब्लाक में शुक्रवार को राज्यमंत्री राममूर्ति सिंह ने किसानों को फसली नुकसान का मुआवजा दिया और गांवों में लेखपालों को मुआवजा देने के लिये भेजा गया था, लेकिन शाम तक उसके पास कोई राहत राशि नहीं आई। अगर शाम तक लेखपाल सरकार के मुआवजे के चंद पैसों का चेक देता तो शायद विश्वपाल की मनोदशा में कुछ बदलाव आता और वह आत्महत्या जैसा कदम नहीं उठाता।
विश्वपाल की मुफलिसी और गरीबी को आलम ये हैं कि उसके नाम पश्चिमी बड़ौदा ग्रामीण बैंक शाखा जमुही में एक बचत खाता है, जिसमें मात्र 65 रुपये की धनराशि है। गांव में जो मकान है वह कच्चा है और बरसात के मौसम में टपकता है। इस परिवार को आवास सुविधा तो दूर राशन से हर माह खाद्यान्न तक नहीं मिलता है।
विश्वपाल की मौत की खबर जब सुर्खियों में आई तो दोपहर बाद तहसील सदर के नायब तहसीलदार और लेखपाल विश्वपाल के घर पहुंचे और सरकार द्वारा दी जाने वाली राहत राशि के नाम परिवार के मुखिया रामबहादुर अथवा उसके परिवार के सदस्यों को सिर्फ आश्वासन ही दिया गया।
निघोना मकरंदपुर में नहीं मिला किसानों को मुआवजा
रोजा। निघोना मकरंदपुर गांव में फसली नुकसान से आहत किसान विश्वपाल सिंह ने मौत को गले लगा लिया। इससे प्रशासन पर कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन विश्वपाल जैसे तमाम किसान ऐसे हैं जो उसकी तरह ही मुफलिसी और आर्थिक तंगी में जी रहे हैं। इनको तत्काल राहत की जरूरत है, लेकिन प्रशासन को देखिए शुक्रवार को पत्रकारों से वार्ता करते हुए एसडीएम सदर जयनाथ यादव ने कहा था कि तहसील सदर के सभी गांवों में शुक्रवार और शनिवार तक फसली नुकसान की राहत राशि का वितरण संबंधित लेखपाल कर देंगे। सरकार से और पैसा मिलने पर किसानों का मुआवजा बढ़ा दिया जायेगा, लेकिन प्रशासनिक दावा विश्वपाल की मौत के बाद निघोना गांव में खोखला ही साबित हुआ। यहां किसानो को मुआवजा देना तो दूर अभी उनकी फसली नुकसान के आंकलन का काम भी पूरा नहीं हुआ।
वाह! रे रोजा पुलिस तेरे खेल निराले
रोजा। अपराध का अल्पीकरण और प्रशासन को गुमराह करने की कला में माहिर है रोजा पुलिस। अपराध घटने से पहले ही रोजा पुलिस को सब कछ मालूम हो जाता है, लेकिन रोकथाम के लिए प्रयास नहीं करते हैं। बानगी देखिए चार दिन पहले भावलखेड़ा की नेहा के प्रकरण में छेड़छाड़ का विरोध करने पर आरोपी योगेश द्वारा आग लगाकर जिंदा जलाने के मामले की जानकारी होने के बाद भी मुकदमा आत्महत्या के लिए उकसाने में दर्ज किया। बखेड़ा हुआ तो बैकफुट आई और मामले को हत्या की धाराओ मेें तरमीम कर दिया। इतना ही नहीं शनिवार की सुबह निघोना मकरंदपुर के विश्वपाल की मौत के मामले में परिवार वाले फसली नुकसान से आहत होने की बात बताते रहे, लेकिन पुलिस ने दबाव बनाकर मृतक के चाचा शिवाजंत सिंह से जबरन लिखवा लिया की विश्वपाल शराबी प्रवृत्ति का है और मानसिक रूप से परेशान रहता था, लेकिन इस सब से पुलिस को कुछ मिलने वाला नहीं था। अपनी आदत से मजबूर यहां की खाकी किसी की मौत पर क्या गुल खिला दे कहा नही जा सकता?