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अंग्रेजों की देन है लाट साहब के जुलूस की परंपरा

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शाहजहांपुर। होली पर लाट साहब का जुलूस निकालने का इतिहास या यूं कहें कि परंपरा बहुत पुरानी है। साफ-सुथरे और हंसी-खुशी के इस माहौल को कुछ हुड़दंगियों ने इसे कुरूप बनाने का प्रयास किया और वह काफी हद तक कामयाब भी हुए। यही कारण है कि आज भी होली की इस अति प्राचीन परंपरा को लेकर समाज ही नहीं, जिला और पुलिस प्रशासन भी चिंतित रहता है। किसी भी अनहोनी से बचने के लिए प्रशासन कई दिन पूर्व से शांति कमेटियों की बैठक के साथ अपनी भी तैयारियां शुरू कर देता है। जुलूस के कारण होली से कई दिन पूर्व से भारी संख्या में अर्धसैनिक बल, पीएसी, कई थानों की पुलिस शहर के चप्पे-चप्पे पर लगा दी जाती है।
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होली पर निकाले जाने वाले लाट साहब के जुलूस के बारे में वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. नानक चंद्र मेहरोत्रा बताते हैं कि शहर के नवाब अब्दुल्ला खां द्वारा मोहल्ला किला पर कब्जा करने के उपरांत होली खेलना शुरू किया था। उदार मनोवृत्ति के होने के कारण नवाब अब्दुल्ला खां को हिंदू और मुसलमान दोनों प्रिय थे। उन्होंने किला के समीप रंगमहल भी बनवाया था, जिसे आज भी रंगमहला मोहल्ला के नाम से जाना जाता है। होली के अवसर पर नवाब किले से बाहर निकलकर रंग खेलने आते थे। उसी समय से नवाब साहब निकल आए का नारा होली पर शुरू हुआ।
इतिहासकार डॉ. मेहरोत्रा बताते हैं कि 1857 की क्रांति के समय नवाब शासकों ने धन वसूली के लिए हिंदू-मुसलमानों पर अत्याचार किए। सन 1858 में हिंदुओं पर नियंत्रण रखने के लिए बरेली से खान बहादुर खान के डिप्टी इन चीफ मरदान अली खां अपनी सेना के साथ शाहजहांपुर आए। यहां उनका जरी कोठी के दो मुस्लिमों से व हिंदुओं से भीषण संघर्ष हुआ। विशेषकर ठाकुरों के वह दुश्मन बन गए। इस संघर्ष में एक समुदाय के कई लोग मारे गए। उनके सिर काटकर किला के दरवाजे पर लटकाए गए और संपत्ति लूट ली गई। वह बताते हैं कि इसके बाद 1859 में जो होली मनाई गई, उसमे अंग्रेज अधिकारियों के उकसाने पर एक समुदाय के लोगों ने रोष व्यक्त करते हुए नवाबों को अपमानित करना शुरू कर दिया। इसी का विकृत रूप आज भी हमारे सामने है।
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डॉ. मेहरोत्रा बताते हैं कि 1930 के दशक में नवाब हाथी, घोड़े और ऊंट पर बैठकर होली पर निकलते थे, चूंकि घरों की दीवारें कम ऊंची होती थीं, जिससे बेपर्दगी होती थी, इसलिए अल्पसंख्यकों की आपत्ति पर नवाब भैंसागाड़ी से निकलने लगे, यह परंपरा भी आज तक चल रही है। वह बताते हैं कि 1947 में इसका नाम बदलकर लाट साहब कर दिया गया।

लाट साहब को सलामी देना गलत
कोतवाली में लाट साहब को कोतवाल द्वारा सलामी देना बिल्कुल भी उचित नहीं है। लाट साहब अंग्रेजों के प्रतीक हैं और अंग्रेज हमारी गुलामी के प्रतीक हैं। जिन्होंने हमें गुलाम बनाकर रखा, उसे सलामी देना उचित कैसे हो सकता है।
डॉ. नानक चंद्र मेहरोत्रा, इतिहासकार

परंपरा के नाम पर इंसानियत पर जुल्म
परंपरा के नाम पर किसी को जूतों-चप्पलों से पीटना, उसे अंधाधुंध शराब पिलाना, जूतों का हार पहनाना इंसानियत पर जुल्म है। होली जैसे पवित्र त्योहार पर ऐसी परंपरा उचित नहीं कही जा सकती। परंपरा तो भाईचारे के साथ अच्छे ढंग से त्योहार मनाने की होनी चाहिए।
मौलाना हुजूर अहमद मंजरी, इमाम जामा मस्जिद

समाजहित में नहीं ये परंपरा
लाट साहब के जुलूस ने बदशकल अख्तियार कर रखी है। हमारे समाज ने तमाम ऐसी परंपराएं खत्म की हैं, जो समाजहित में नहीं थीं। यह परंपरा भी बदली जानी चाहिए। होली जैसे रंगों और भाईचारे के त्योहार पर कुछ समय के लिए तनाव तो हो ही जाता है, जो गलत है। अब हमें अच्छी परंपराएं डालने की जरूरत है। इस पर विचार किया जाना चाहिए।
सैयद मसूद हसन, शहर काजी

परंपरा बदलना समय की मांग
होली पर तो होलिका में सारे विकार जला दिए जाते हैं और मेल-मिलाप, भाईचारे के रंगों से सराबोर कर समरसता का संदेश दिया जाता है। जो भी परंपरा है, अब उसे बदले जाने पर विचार किया जाना चाहिए, यही समय की मांग भी है। हिंदू धर्म में वैमनस्यता का कोई स्थान वैसे भी नहीं है। इसीलिए त्योहार पर गले मिलने की भी परंपरा है।
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पंडित अवधेश मिश्र, ज्योतिषाचार्य
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