खुदागंज। देश के अधिकांश शहरों में चार मार्च को होली खेली जाएगी, लेकिन नगर में सदियों पुरानी परंपरा के तहत आठ मार्च को रंगपंचमी तिथि पर रंग खेला जाएगा। बड़े-बुजुर्गों का कहना है कि कि रंग पंचमी पर रंग खेलने की यह परंपरा उनके बुजुर्गों के जमाने से चली आ रही है, लेकिन इस परंपरा की ठोस वजह कोई नहीं जानता और सभी अलग-अलग निहितार्थ बताते हैं।
खास यह है कि यहां होलिका दहन सर्वमान्य शास्त्र सम्मत शुभ मुहूर्त में ही होता है। अगले दिन परेवा तिथि पर आखत भी डाले जाते हैं, लेकिन बाद में रंग खेलने के बजाय लोग रोजमर्रा के कामों में व्यस्त हो जाते हैं। इस बार भी बुधवार चार मार्च को होलिका में आखत डाले जाएंगे, लेकिन रंग चार दिन बाद आठ मार्च को खेला जाएगा।
नगर के 75 वर्षीय बुजुर्ग शेर सिंह अनुसार, भारत में सिर्फ दो स्थानों उज्जैन के महाकाल मंदिर और नगर में रंग पंचमी के दिन होली खेली जाती है। पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष सुधीर सिंह के अनुसार, कोई तो वजह होगी कि नगर में सैकड़ों साल से रंग पंचमी के ही दिन रंग खेला जाता है।
पंडित राजेंद्र पांडेय ने बताय कि काशी के सर्वमान्य महावीर पंचांग सहित हिंदू धर्म के अन्य पत्रा में चैत्र मास की पंचमी तिथि को रंग पंचमी लिखा जाता है। इसीलिए स्थानीय बुजुर्गों ने रंग पंचमी के दिन रंग खेलने की परंपरा शुरू की।
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टेसू के रंग से खेली जाने वाली होली की बाकी रह गईं यादें
खुदागंज। कई दशक पहले टेसू के प्राकृतिक रंग से होली खेली जाती थी, लेकिन रासायनिक रंगों के बढ़ते प्रचलन ने होली पर रंग खेलने की परंपरा को विकृत कर दिया है। ऐसे में टेसू के रंग से होली खेले जाने की सिर्फ यादें बाकी रह गई हैं। लोग टेसू के फूलाें को उबालकर प्राकृतिक पीला रंग बनाकर उसी से होली खेलते थे। टेसू के फूलों का प्राकृतिक रंग त्वचा को कोई हानि पहुंचाने के बजाय शीतलता का आभास कराता था। संवाद