सिर्फ 26 रुपये की पूंजी हो और कर्ज चुकाना हो चार लाख का। ऐसी स्थिति किसी भी इंसान को आत्महत्या करने पर मजबूर कर सकती है। वो भी तब जब कर्ज अदा करने का एकमात्र सहारा उसकी फसल पूरी तरह से बर्बाद हो चुकी हो और कर्ज चुकाने का कोई दूसरा रास्ता न हो। बस इसी ऊहापोह की जंग में अशोक हार गया और उसने फांसी लगाकर जान दे दी।
बैंक ऑफ बड़ौदा के अकर्रा रसूलपुर शाखा में अशोक का बैंक खाता खुला था। उसकी खाते में आखिरी बार इंट्री 31 अक्तूबर को हुई थी, जिसमें उसके बैंक खाते में 26 रुपये जमा था। इसी से उसकी माली हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है। पिता राजाराम के मुताबिक उन्होंने 2.31 लाख रुपये का क्रॉप लोन लिया था। साथ ही 23 हजार रुपये कोऑपरेटिव से लोन लिया था। इसके साथ ही उन्होंने करीब सवा डेढ़ लाख रुपये सूदखोरों एवं अन्य लोगों से उधार ले रखा था। कुल करीब चार लाख रुपये का कर्ज उन लोगों को चुकाना था।
चार भाइयों में अशोक दूसरे नंबर का था, लेकिन घर की सारी जिम्मेदारी को वह खुद ही संभालता था। बीते एक माह से पिता के मानसिक रोगी हो जाने के बाद से वह काफी परेशान रहने लगा था। मोहल्ले वालों के मुताबिक हमेशा हंसकर बात करने वाला अशोक गुमसुम रहता था। वजह पूछने पर बस यूं ही कहकर बात टाल जाता था। कर्ज चुकाने की टेंशन को खामोशी से सहने का धैर्य खत्म होने की वजह से ये हादसा हो गया। मंगलवार की शाम साढ़े पांच बजे के करीब अशोक पत्नी अनीता से लैट्रीन जाने की बात कहकर गया था और जीटीआई के पास स्थित खेत में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।
किसके सहारे जिएंगे चार बच्चे?
अशोक के चार छोटे-छोटे बच्चे हैं। सबसे बड़े बेटे की उम्र ही महज छह साल के करीब है। उससे छोटा एक बेटा और है। वहीं करीब डेढ़ साल की दो जुड़वां बेटियां भी हैं। ये बच्चे अब किसके सहारे रहेंगे? चिंता के इस भाव का अंदाजा अशोक की पत्नी अनीता के विलाप को देखकर कोई भी आसानी से लगा सकता था। वो भी तब जब अशोक के पिता राजाराम मानसिक रोगी हो गए हों।
...जिसने भी देखा आंखें भर आईं
अशोक के घर में मौत की सूचना मिलने पर उसके घर में रोना-पीटना मच गया। मां श्रीदेवी, पिता राजाराम और पत्नी अनीता, बड़े बेटे अनुज सहित घरवालों और परिवार वालों को रोते देखकर शायद ही कोई आंख बची हो, जो आंसुओं से नम न हो।
कई सालों से नहीं हो सकी घर की बाउंड्रीवाल
कहने को तो अशोक का पक्का बना था, लेकिन पूरे घर में न तो फर्श था और न ही दीवारों पर प्लास्टर था और तो और गली से गुजरने वाला कोई भी व्यक्ति घर के अंदर तक झांक सकता था, क्योंकि उसके घर में बाउंड्रीवाल नहीं थी। घर के अंदर बिस्तर, चारपाई और अन्य सामान को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनकी माली हालत अच्छी नहीं थी।
एक लाख का गेहूं मिलने की लगी थी आस
लालपुर गांव के पूर्व प्रधान हरिपाल वर्मा और अशोक के तहेरे भाई के मुताबिक उन लोगों ने करीब 25 बीघा खेत में गेहूं बोया था, जो फसल पककर तैयार हो गई थी। ये फसल करीब एक लाख रुपये से अधिक की बिक सकती थी। सोच यह थी गेहूं को काटकर कोऑपरेटिव के 32 हजार और इधर-उधर से लिए गए कर्ज को चुका देंगे, लेकिन फसल के बर्बाद हो जाने और बढ़ते ब्याज के साथ रकम चुकाने का कोई रास्ता नजर न आने पर ही अशोक ने ऐसा कदम उठा लिया।