डॉ. शर्मा ने असम से आए संसदीय सचिव डॉ. मान सिंह रंगपी एवं असम सुबा एग्रो के प्रबंध निदेशक का स्वागत किया। कहा कि यहां के उन्नत किस्म के बीजों का चाय बगानों के अनुकूल इलाके में खेती शुरू किया जाना सकारात्मक पहल है। उन्होंने प्रतिभागियों से अपील की कि प्रशिक्षण की सार्थकता तभी है जब किसान वैज्ञानिकों द्वारा बतायी गयी तकनीकी को अपनाने के साथ-साथ अपने क्षेत्रों में प्रसार-प्रचार भी करें। परिषद द्वारा 212 प्रजातियां विकसित की गई हैं। इनमें से 49 सामान्य खेती के प्रचलन में हैं जिससे चीनी मिलें 11 से 12 फीसदी तक का परता पा रही हैं जो अभी तक केवल महाराष्ट्र या दक्षिणी राज्यों में रहता रहा है। परिषद में विकसित प्रजातियों में 90 से 95 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन की क्षमता है जबकि उत्तर प्रदेश में गन्ना की औसत उपज 65 टन प्रति हेक्टेयर है। वरिष्ठ वैज्ञानिक वीके श्रीवास्तव, डॉ. एससी सिंह, डॉ. मदन लाल, डॉ. केपी पांडेय और डॉ. अनेग सिंह ने प्रशिक्षणार्थियों को प्रजातियों की पहचान से लेकर फसल में लगने वाले कीट का प्राकृतिक निदान और मृदा परीक्षण कराकर खाद के इस्तेमाल से उपज में होने वाले लाभ की जानकारी दी। संचालन प्रसार अधिकारी संजीव कुमार पाठक ने किया। इस दौरान मध्य प्रदेश आए केशव राव, श्याम किशोर समेत मिल प्रबंधनों के लोग मौजूद थे।