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शुद्धता की गारंटी बिना बिक रहे पानी के कंटेनर, पाउच

Sat, 04 Jul 2015 11:27 PM IST
शाहजहांपुर।
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भीषण गर्मी में खुश्क गला तर करने के लिए ठंडे पानी की चाह हर किसी को चाह होती है। उधर, जब से आरओ निर्माताओं ने अपने उत्पादों की उपयोगिता बताते हुए पानी में अशुद्धता का ढिंढोरा पीटना शुरू किया, लोग ड्रिंकिंग वाटर को लेकर इतना सचेत हो गए हैं कि घरों में लगे हैंड पंपों का पानी पीना छोड़कर बाजार में बिकने वाले फिल्टर्ड वाटर का इस्तेमाल करने लगे हैं। इसलिए चिलर प्लांट वाले पानी के कंटेनर और पाउच इस्तेमाल करने शुरू कर दिए, लेकिन इस पानी में भी शुद्धता की कोई गारंटी नहीं है।
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जल संसाधन मंत्रालय की चौंकाने वाली रिपोर्ट
जो लोग पानी की शुद्धता को लेकर सचेत नहीं हैं, उनके लिए जल संसाधन मंत्रालय की दो साल पहले जारी रिपोर्ट चौंकाने वाली है। इसके मुताबिक कल-कारखानों से विषाक्त कचरा बहाए जाने और अन्य स्रोतों से गंदगी का घालमेल होने के कारण सभी राज्यों के भूगर्भ जल भंडार में तमाम ऐसे रसायनों और तत्वों की मात्रा बढ़ रही है जो कैंसर सहित कई लाइलाज बीमारियों को बढ़ावा दे रहे हैं। अपने शहर को ही लें। पर्यावरण को समर्पित संस्था पृथ्वी के शोध नतीजे भी इस बात की तस्दीक कर चुके हैं कि नदियों समेत शहर के भूगर्भ जल में फ्लोराइड, सीसा आदि भरी धातुओं की मात्रा बढ़ रही है।


डॉक्टरों की चेतावनी धंधेबाजों के लिए बनी ढाल
डॉक्टर भी मानते हैं कि कैंसर, त्वचा रोग, घेंघा, नर्वस ब्रेक डाउन, पेट की खराबी आदि 50 फीसदी बीमारियां अशुद्ध पेयजल के सेवन से होती हैं। चिकित्सा विज्ञान की इसी राय को पानी के धंधेबाजों ने अपने व्यवसाय की डाल बना लिया है। इसी का नतीजा है कि शहर में किला से लेकर जलालनगर और निगोही रोड तक करीब एक दर्जन चिलर प्लांट खुल गए हैं। व्यवसायिक प्रतिद्वंदिता के चलते पानी की तिजारत करने वाले अपना प्लांट साफ-सुथरा बताकर दूसरों पर अशुद्ध पानी परोसने का आरोप मढ़ते हैं, जबकि हकीकत इसके उलट है।
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कंटेनरों, पाउचों की नहीं जांची जा रही गुणवत्ता
एक अनुमान के अनुसार शहर के बाजारों और घरों में रोजाना 15 लीटर वाले लगभग तीन हजार कंटेनरों और डेढ़ लाख पाउचों की खपत हो रही है। हैरत की बात यह है कि धंधेबाजों के आरोप-प्रत्यारोप के इस माहौल में भी खाद्य सुरक्षा विभाग चिलर प्लांट से पानी के नमूने लेने में दिलचस्पी नहीं ले रहा। चूंकि, 12 से 15 हजार रुपये की आरओ मशीन लगाने की क्षमता हर किसी में नहीं है, इसलिए मध्यवर्गीय लोग धड़ल्ले से कंटेनरों और पाउचों का पानी इस्तेमाल कर रहे हैं।


बोतल बंद मिनरल वॉटर की गुणवत्ता भी संदिग्ध
बात पेयजल की गुणवत्ता की करें तो विभिन्न ब्रांडेड कंपनियों का बोतल बंद मिनरल वॉटर भी संदिग्ध है। इसका सुबूत गत आठ जून को रेलवे स्टेशन पर उस वक्त मिला जब शहर के वकील मनोज गुप्ता ने मोहम्मदी रोड स्थित श्रीराम खन्ना एक्वा प्रॉडक्ट्स द्वारा निर्मित पानी की बोतल खरीदने पर उसमें कीड़े तैरते देखे। उनकी शिकायत पर खाद्य सुरक्षा अधिकारी युगल किशोर ने उसी दिन फैक्ट्री पर छापा मारकर बोतल बंद पानी का नमूना सील किया। अभी नमूना रिपोर्ट नहीं आई, लेकिन ब्रांडेड मिनरल वॉटर की शुद्धता पर सवाल खड़े होने लगे हैं।


लाइसेंसिंग परिधि से बाहर हैं खुले पानी के सप्लायर
खाद्य सुरक्षा विभाग के अधिकारियों की मानें तो खुला पानी सप्लाई करने वाले लोग लाइसेंसिंग की परिधि में नहीं आते। इसी वजह से चिलर प्लांट पर केवल पानी के स्रोत की जांच की जाती है। निरीक्षण में डीप बोर वेल की एक बार पुष्टि होने के बाद अफसर वहां झांकने की जरूरत नहीं समझते।

चिलर प्लांट चिन्हित करने का काम शुरू
खाद्य सुरक्षा विभाग के अभिहीत अधिकारी टीआर रावत को नहीं पता कि शहर में पानी के कितने चिलर प्लांट कहां-कहां लगे हैं। उन्होंने चालू सीजन में कंटेनरों और पाउचों मेें बिकने वाले पानी का कोई नमूना नहीं लिए जाने की पुष्टि करते हुए कहा कि फिलहाल विभाग के पास पानी बेचने वालों का कोई रिकार्ड नहीं है, लेकिन जन स्वास्थ्य की दृष्टि से ऐसे चिलर प्लांट चिन्हित करने का काम शुरू करा दिया गया है।
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