डॉ. विकास खुराना, इतिहास विभागाध्यक्ष, एसएस कॉलेज
शाहजहांपुर। नौ अगस्त 1925 को काकोरी ट्रेन एक्शन केवल सरकारी खजाना लूटने की घटना नहीं थी, बल्कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ क्रांतिकारियों की साहसिक कार्रवाई थी। घटना से हिली ब्रिटिश सरकार ने क्रांतिकारियों के खिलाफ माहौल बनाने और उन्हें बदनाम करने के लिए अखबारों को अपना हथियार बनाया। अगले ही दिन खबरें छपीं कि काकोरी में ट्रेन लूट के दौरान एक अंग्रेज सैन्य अधिकारी समेत कई लोग मारे गए। जिसकी हत्या की खबर फैलाई गई थी, मेजर रैंक का वह अधिकारी डर के कारण ट्रेन के वाशरूम में खुद को बंद किए रहा और लखनऊ पहुंचने तक बाहर नहीं निकला।
एसएस कॉलेज के इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. विकास खुराना ने बताया कि काकोरी एक्शन में शामिल क्रांतिकारी मन्मथनाथ गुप्ता ने वर्षों बाद अपनी पुस्तक दे लिव्ड डेंजरसली में उस रात की पूरी कहानी दर्ज की। मन्मथनाथ गुप्ता के अनुसार, सभी क्रांतिकारी शाहजहांपुर स्टेशन से आठ डाउन ट्रेन में सवार हुए थे। काकोरी पहुंचकर चेन खींचकर ट्रेन रोक दी गई।
खजाने का संदूक नीचे उतारकर हथौड़े से तोड़ा गया। मन्मथनाथ गुप्ता के मुताबिक क्रांतिकारी आधी रात को खजाने से भरा थैला लेकर लखनऊ पहुंचे। सुबह करीब चार बजे अखबारों के हॉकर आवाज लगाने लगे-काकोरी में ट्रेन लूट, कई लोग मारे गए। करीब छह बजे मन्मथनाथ गुप्ता ने द डेली टेलीग्राफ खरीदा। खबर कई कॉलम में छपी थी। उसमें एक अंग्रेज सैन्य अधिकारी समेत कई लोगों की मौत का दावा किया गया था।
मन्मथनाथ गुप्ता अपनी किताब में लिखते हैं कि क्रांतिकारियों ने हवा में गोलियां चलाईं थीं। एक व्यक्ति अमजद अली को धोखे से गोली लगी थी, जिसकी बाद में मौत हुई। किसी अंग्रेज अधिकारी की हत्या नहीं हुई थी। मुकदमे में इस दावे की पोल खुल गई।
अशफाक, बिस्मिल और रोशन सिंह को हुई फांसी
काकोरी एक्शन में करीब 40 लोगों को गिरफ्तार किया गया। पं. रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, ठाकुर रोशन सिंह को फांसी की सजा दी गई। (संवाद)
डॉ. विकास खुराना, इतिहास विभागाध्यक्ष, एसएस कॉलेज