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पूर्वांचल की सुहागिनें 48 घंटे के उपवास पर

Wed, 29 Oct 2014 05:34 AM IST
Shahjahanpur
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- महापर्व छठ के दूसरे दिन खरना कार्यक्रम के तहत गाए गीत
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- केले के पत्ते पर छठ मइया को भोग लगाकर ग्रहण किया प्रसाद
अमर उजाला ब्यूरो
शाहजहांपुर। पूर्वांचल का महापर्व छठ कहने को तो सोमवार को नहाय-खाय कार्यक्रम से शुरू हो गया था, लेकिन सुहागिनों के 48 घंटे का उपवास अर्थात मुख्य पर्व मंगलवार से ही आरंभ हुआ। खरना कार्यक्रम के अंतर्गत सुहागिनों ने उपवास शुरू करने से पूर्व एकत्र होकर छठ मइया की विधिवत पूजा अर्चना की और उन्हें खीर-पूड़ी का भोग लगाया। छठ मइया को केले के पत्ते पर भोग लगाने के बाद उन्होंने खीर-पूड़ी का प्रसाद लेकर उपवास आरंभ किया, जो बृहस्पतिवार की सुबह सूर्यदेव को अर्घ्य देने के बाद ही परायण किया जाएगा।
छठ पर्व के दूसरे दिन खरना मनाने के लिए बड़ी संख्या में महिलाएं डबल स्टोरी में बृजेश तिवारी के आवास पर एकत्र हुईं। वहां उन्होंने छठ मइया को प्रसन्न करने के लिए गीत गाए और बाद में खीर-पूड़ी का भोग लगाया। केले के पत्ते पर यही प्रसाद सभी में बांटा भी गया। खीर-पूड़ी खाने के बाद महिलाओं ने छठ का उपवास शुरू किया। उपवास रखने वाली महिलाओं में पर्व को लेकर खासा उत्साह है। मंगलवार की रात से उपवास रखने के बाद सुहागिनें बुधवार की शाम खन्नौत नदी में स्नान कर डूबते सूर्य को सीजन सब्जियों, फलों का भोग लगाकर गाय के दूध से अर्घ्य देंगी और रात को गीत गाकर जगराता करेंगी। व्रत का परायण बृहस्पतिवार को उगते सूर्य को अर्घ्य देकर और आटा-गुड़ के बने ठिकुआ (गुलगुले) खाकर उपवास तोड़ेंगी। तब तक वह निर्झला उपवास में ही रहेंगी।
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48 घंटे का निर्जला उपवास रखने वाली सुहागिनें बोलीं
जीवन को खुशियों से
भरती हैं छठ मइया
अमर उजाला ब्यूरो
शाहजहांपुर। संतानाें और पति की दीर्घायु और परिवार में सुख-समृद्धि बरसाने वाली छठ मइया का उपवास रखने की लालसा और उल्लास अलग ही होता है। यह खुशी उन महिलाओं में देखने को भी मिली, जो उपवास शुरू कर चुकी हैं। पूर्वांचल की इन सुहागिनों ने अपने अनुभव बांटते हुए त्योेहार से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी तो दी ही, साथ ही छठ मइया के उपकारों के प्रति कृतज्ञता भी जताई।


प्रतीक्षा रहती है त्योहार
की: जनक लली
जनक लली तिवारी बताती हैं कि वह पिछले 20 वर्षों से उपवास रख रही हैं और आज भी उसी तरह इस त्योहार की प्रतीक्षा करती हैं, जैसे पहले साल की थी। बताती हैं कि पहले दिन लौकी, चावल और चने की दाल खाकर त्योहार शुरू किया जाता है, दूसरे दिन खरना पर्व मनाते हैं और इसी दिन से 48 घंटे का उपवास शुरू हो जाता है। इस त्योहार में नमक नहीं खाया जाता। गुड़-आटा से बना ठिकुआ (गुलगुला) खाकर उपवास का परायण किया जाता है।


सास से विरासत में
मिला उपवास: सरिता
सरिता यादव बताती हैं कि यह महापर्व पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता है। उन्हें भी यह खुशी सास ने विरासत में दी है, जिसका निर्वहन वह पूरी निष्ठा और श्रद्धा से कर रही हैं। बताती हैं कि किसी ने अन्य देवी-देवताओं को तो देखा नहीं है और सूर्यदेव सभी को एक समान प्रकाश देते हैं, इसलिए ही सूर्यदेव की उपासना की जाती है। डूबते सूर्य को फल, मिष्ठान आदि का भोग अर्पित कर गाय के दूध से अर्घ्य दिया जाता है। यह अर्घ्य कोई भी पुरुष दिला सकता है। इससे सुख-संपन्नता बढ़ती है।



मनोकामना पूरी करती
हैं छठ मइया: किरन
किरन सिंह का यह तीसरा उपवास है, जो वह रहने जा रही हैं। बताया कि शादी से पहले भी उनका मन उस व्रत को लेकर बहुत होता था, लेकिन शुरू विवाह के बाद ही हो पाया। उन्होंने बताया कि पूर्वांचल में गाय के दूध से सूर्य भगवान को अर्घ्य पंडित ही दिलाते थे, लेकिन इसे पति, बेटा, मित्र, पड़ोसी कोई भी दिला सकता है। मन की भावना साफ-सुथरी होनी चाहिए। छठ मइया सभी की मनोकामना पूरी करती हैं। वह किसी के साथ भेदभाव नहीं करतीं।
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छठ मइया का बहुत
उपकार है: ऊषा
अपना 31वां उपवास रखने वाली ऊषा ओझा छठ मइया का उपवास शुरू करने से बहुत खुश नजर आ रही थीं। बताया: उन्हीं की कृपा और आशीर्वाद से वह मां बनीं और उनकी संतानें पढ़-लिखकर उच्च पदों पर सर्विस कर रही हैं। छठ मइया ने उन्हें बहुत कुछ दिया है, उनकी कृपा से ही घर धन-धान्य से परिपूर्ण है और सभी स्वस्थ और प्रसन्न भी हैं। एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि अब नई बहुएं उस परंपरा का निर्वहन नहीं कर पाती है, जो उन्होंने किया है। कुछ तो उपवास भी नहीं रखती, सिर्फ पूजा कर लेती हैं।
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