- स्लाटर हाउसों में धड़ल्ले से काटे जा रहे दुधारू जानवर
- पांच वर्ष में कम हो गए 2.43 लाख से अधिक दुधारू पशु
- मांग के सापेक्ष दुग्ध उत्पादन घटने से बढ़ रहे दूध के दाम
अमर उजाला ब्यूरो
शाहजहांपुर। जिले में प्रतिबंधित पशुओं के मांस का कारोबार धड़ल्ले से होने के कारण स्लाटर हाउसों में दुधारू पशु काटने में भी कोई संकोच नहीं किया जा रहा। पांच वर्ष के अंतराल पर हुई पशुगणना के नतीजे भी इस सच्चाई को बयां करते हैं। दुधारू पशुओं की संख्या घटने से दूध का संकट बढ़ रहा है और उसी अनुपात में दूध के दाम भी बढ़ रहे हैं।
वर्ष 2007 मेें कराई गई पशुगणना के अनुसार उस वक्त जिले में विभिन्न प्रजातियों के 12 लाख से अधिक पशु थे। दुधारू पशुओं की बात करें तो उस वक्त गौवंशीय और महिषवंशीय (भैंस प्रजाति) के 8.04 लाख से अधिक पशु थे। इसके विपरीत दो साल पहले कराई गई पशुगणना में उपरोक्त दोनों प्रजातियों के दूध देने वाले पशुओं की संख्या 5.60 लाख तक सिमट गई। इस बीच, दुधारू पशुओं का कुनबा बढ़ा, लेकिन उससे अधिक संख्या में पशु स्लाटर हाउस की भेंट चढ़ गए।
हालांकि, अधिकारी पशुओं की संख्या घटने का एक कारण यह भी मानते हैं कि बदली जीवन शैली में पशुपालन के लिए शहरी लोगों के पास न तो समय है और न ही पशुओं को बांधने का ठौर-ठिकाना। जो भी हो, नतीजा दूध की किल्लत के तौर पर सबके सामने है। पशुपालन विभाग क अधिकारियों का मानना है कि करीब 25 फीसदी दुधारू पशु रोजाना औसतन चार लीटर दूध देते हैं। इस आधार पर जिले में रोजाना 5.60 लाख लीटर दुग्ध उत्पादन होता है। इसमें से 12 से 15 हजार लीटर दूध रौसर कोठी की दुग्ध उत्पादन समिति के चिलिंग प्लांट को चला जाता है। रही-बची कसर आइसक्रीम और देसी घी के कारोबारी पूरी कर रहे हैं।
दरअसल, इस धंधे से जुड़े लोगों ने भी अपने चिलिंग प्लांट लगा रखे हैं जो कि दूध को शून्य से चार डिग्री कम तापमान पर फ्रीज करके अपने पास उसका स्टॉक जमा कर लेते हैं। दूध की जो मात्रा शेष बचती है, उसमें पानी मिलाकर दूधिए खुदरा बिक्री को परवान चढ़ाते हैं। दूध के अधिकांश नमूनों में सॉलिड नॉट फैट (एसएनएफ) की मात्रा कम पाए जाने की वजह भी यही है। गनीमत यह है कि दूध की किल्लत के बावजूद अभी यहां के कारोबारियों ने सिंथेटिक दूध के धंधे में हाथ नहीं डाला, वरना दूध जैसा स्वास्थ्यवर्धक पेय नौनिहालों की सेहत के लिए खतरा बन जाता।
पशुओं के स्वास्थ्य पर
दुग्ध उत्पादन निर्भर
‘दुग्ध उत्पादन में पशु चिकित्सा विभाग की भूमिका सीमित है। विभाग का केवल इतना प्रयास रहता है कि पशु पूरी तरह स्वस्थ रहें क्योंकि स्वस्थ पशु ही ज्यादा दूध देने में सक्षम होते हैं।’
-डॉ. इंद्रमनि, मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी