0 डिजिटल अंगूठा निशान देेने को भटके बुजुर्ग पेंशनर्स
0 राह रोक रही हैं कलक्ट्रेट में बेरीकेडिंग की बल्लियां
शाहजहांपुर। करीब 80 बरस की शरबती देवी अपनी जर्जर काया लिए जब खुद के जीवित होने का प्रमाणपत्र देने कलेक्ट्रेट पहुंचीं तो रास्ते में लगी बल्लियों ने उनका रास्ता रोक लिया। उम्र के इस पड़ाव में पेंशन के रहमोकरम पर जिंदगी गुजार रहीं शरबती के पैर वहीं लड़खड़ा गए और वह वहीं निढाल हो गईं। भर्राती आवाज में बोलीं, हमैं पेंशन नाय चाहिए, जा पेंशन से तो अच्छा घर मा परे रहन देओ। वह बेसिक शिक्षा विभाग के एक स्कूल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पद से करीब दो दशक पहले रिटायर हुईं थीं और सोमवार को कलक्ट्रेट अपनी पुत्रवधू सोमवती के साथ आईं थीं। उन्हें निढला देखकर कुछ लोग आगे बढ़े और सहारा देकर उठाया। हलक से थोड़ा पानी नीचे उतरा तो आंखों से आंसू बाहर आ गए। शरबती की ही तरह कुछ अन्य महिलाएं और बुजुर्ग भी दीमक लग चुके सरकारी सिस्टम की मार से सुबक रहे थे। विभिन्न विभागों से सेवानिवृत्त हुए लगभग 13000 कर्मचारी कोषागार के माध्यम से पेंशन प्राप्त कर रहे हैं। इन्हें हर साल नवंबर से दिसंबर के बीच जीवन प्रमाण पत्र जमा करने के लिए बुलाया जाता है। घर से ट्रेजरी तक की यह दौड़ वयोवृद्ध हो चुके उन सभी पेंशनरों को बेहद कष्टकारी साबित होती है, जो अधिकांश समय बिस्तर पर रहकर जीवन का अंतिम समय व्यतीत कर रहे हैं।
इन्हें कुछ राहत देने के लिए जिला कोषागार में पेंशनरों के जीवन प्रमाण पत्र जमा कराए जाने के साथ उनके डिजिटल अंगूठा निशान लिए जाने की प्रक्रिया की भी व्यवस्था की गई थी पर यह व्यवस्था भी दम तोड़ रही है। एक बार डिजिटल थंब रिकार्ड होने पर पेंशनर अपने कस्बे के नजदीकी जन सुविधा केंद्र पर जाकर अंगूठा निशान दे सकता है, जिसका कोषागार की वेबसाइट पर कर्मचारी मिलान कर पेंशन चालू रखेंगे। पर फिलहाल, पेंशनरों के हित की यह स्कीम व्यवस्थागत खामियों के चलते उनके लिए परेशानी का सबब बन गई है। अब तक मुश्किल से 1200 पेंशनरों के डिजिटल अंगूठा रिकार्ड हो पाए हैं। हालांकि, इस काम के लिए सहायक कोषाधिकारी राजेश गिरि ने दो अतिरिक्त काउंटर खुलवाए हैं, लेकिन पेंशनरों को वहां तक पहुंचना कठिन हो रहा है। वहीं, स्थानीय निकाय चुनाव को नामांकन के मद्देनजर कलक्ट्रेट कैंपस में बेरीकेडिंग के लिए कलक्ट्रेट की ओर खुलने वाले ट्रेजरी गेट के सामने लगाई गईं बल्लियां बुजुर्ग की राह को और मुश्किल कर रही हैं। इनके लिए अलग से कोई रास्ता देने की व्यवस्था नहीं की गई है। जैसे-तैसे ट्रेजरी के पेंशन कक्ष जाने पर सर्वर की धीमी रफ्तार के चलते वहां उमड़ रही भीड़ उन्हें और हताश कर देती है।
सहायक कोषाधिकारी राजेश गिरि के अनुसार सर्वर की स्पीड कम होने से प्रमाणपत्र जमा करने के साथ डिजिटल अंगूठा निशान लेने में पांच से सात मिनट लग रहे हैं।
डिजिटल अंगूठा निशान देेने के बाद पेंशनरों को हर साल अपने जीवित होने का सुबूत देने के लिए कोषागार नहीं आना पड़ेगा। जो पेंशनर्स अत्यधिक बुजुर्ग होने के कारण चलने-फिरने में असमर्थ हैं, उन्हें भी अंगूठा निशान देने के लिए एक बार ट्रेजरी तक लाना अनिवार्य होगा।
-शैलेंद्र्र प्रताप सिंह, वरिष्ठ कोषाधिकारी