दो साल में सात करोड़ की खराब मैगी खा गए बच्चे
मैगी में मिलावट के दोषियों को सजा तो हुई पर सरकारी सिस्टम के चलते मलावटखोरी पर नहीं लग रहा प्रभावी अंकुश
क्रॉसर...
0 प्रयोगशाला से नमूनों की जांच रिपोर्ट आने में लग रहे दो माह
0 मुकदमों की सुनवाई में बीत जाता है एक-डेढ़ वर्ष का समय
अमर उजाला ब्यूरो
शाहजहांपुर। बहुराष्ट्रीय कंपनी नेस्ले के लोकप्रिय उत्पाद मैगी मैगी के नमूनों की जांच रिपोर्ट से लेकर दोषियों पर कार्रवाई का निर्णय आने तक दो साल के वक्त के दरम्यिान बाजार में बच्चे और बड़े खराब मैगी चटकारे लेकर खा रहे थे। एक अनुमान के मुताबिक जिले में छोटी-बड़ी लगभग 300 कंफेक्शनरी शॉप हैं और हर काउंटर पर प्रतिमाह औसतन करीब 10000 रुपये के मैगी उत्पादों की बिक्री हो रही है। इस हिसाब से दो साल में सात करोड़ से ज्यादा की मैगी के उत्पादों की बिक्री हो चुकी थी। हालांकि कोर्ट के फैसले ने दोषियों को सजा देकर सख्त संदेश दिया। दोषी निर्माता, वितरक, विक्रेताओं आदि पर 62 लाख रुपये का रिकार्ड जुर्माना भी किया ताकि सेहत से खिलवाड़ बंद किया जा सके पर सरकारी सिस्टम की ढिलाई के चलते मिलावटखोरी में लिप्त लोगों पर प्रभावी अंकुश नहीं लग पा रहा है।
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इसलिए सिस्टम पर खड़े हो रहे सवालिया निशान
मैगी उत्पादों के जो सात नमूने राजकीय जन विश्लेषक प्रयोगशाला जांच में एश कंटेंट की अधिकता के चलते खराब घोषित किए गए, वे वर्ष 2015 में मई व जून माह में भरे गए थे। ये सारे नमूने एक सप्ताह के अंदर जांच के लिए लखनऊ भेज दिए गए। नियमानुसार प्रयोगशाला में उनकी जांच एक माह में हो जानी चाहिए। इसके विपरीत मई में लिए गए नमूनों की रिपोर्ट अक्तूबर में और जून के नमूनों की जांच रिपोर्ट नवंबर में प्राप्त हुईं। रिपोर्ट मिलने के बाद मुकदमे किए जाने से पहले संबंधित विक्रेताओं, निर्माताओं को नोटिस भेजकर एक माह के अंदर उनका पक्ष लिया जाता है, लेकिन इस प्रक्रिया को पूरा करने मेें डेढ़-दो माह का समय खर्च हो गया। नतीजतन, इन मामलों को एडीएम कोर्ट पहुंचाने (मुकदमे दर्ज कराने) में भी दो माह अतिरिक्त लग गए। बाद में एक साल मुकदमों की सुनवाई और उनके निर्णय में बीत गया।
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सितंबर से अब तक सिर्फ दो नमूनों की मिली रिपोर्ट
सिस्टम की ढिलाई का ही यह नतीजा है कि जिले में गत एक सितंबर से अब तक दूध समेत विभिन्न खाद्य वस्तुओं के 48 नमूने लिए जा चुके हैं, लेकिन उनमें से केवल दो नमूनों की जांच रिपोर्ट मिल सकी है। अधिकारिक सूत्रों के अनुसार सितंबर में 19, अक्तूबर में 22 और नवंबर में सात नमूने लिए जा चुके हैं। इनमें दिवाली के दौरान दूध, मावा और मिठाइयों के नमूने भी शामिल हैं, लेकिन लचर व्यवस्था के चलते इन मामलों मेें निर्णय होली से पहले होने के कोई आसार नहीं हैं।
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शासकीय प्रक्रिया पूरी करने में लग रहा समय
कोई भी नमूना प्रयोगशाला जांच की कसौटी पर फेल होने के बाद कोर्ट में मुकदमा दायर होने तक शासन से निर्धारित तमाम प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ता है। मुकदमों की सुनवाई में भी पक्षकारों को तलब कर उन्हें और उनके वकीलों को सुनने में करीब एक साल लग जाता है। मुकदमों की सुनवाई में जल्दबाजी इसलिए नहीं होती कि किसी भी निर्दोष को सजा नहीं होने पाए और दोषी किसी भी दशा में कार्रवाई से बच नहीं सकें।
-डीपी सिंह, मुख्य खाद्य सुरक्षा अधिकारी