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हरिंदर कौर के जज्बे ने लिखी संघर्ष की नई इबारत

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शाहजहांपुर। हरिंदर कौर उस अबला का नाम है, जिसने संघर्ष की नई इबारत लिखकर न सिर्फ समाज को चुनौती दी, बल्कि हौसलों को उड़ान भरने के लिए एक नया आसमान भी दिया। कदम-कदम पर मिलीं ठोकरों को मुकद्दर का खेल मानने वाली हरिंदर कौर ने बच्चों की खातिर हर दुख को गलेे लगाया और विधाता की लेखनी को भी झुकने के लिए मजबूर कर दिया।
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हरिंदर कौर को 14 फरवरी 1984 की वह काली रात आज भी याद है। रात के करीब सवा आठ बजे होंगे, जब उनके पति अपार सिंह सुनहरी मस्जिद के समीप अपनी साइकिल की दुकान बढ़ा रहे थे। ताला लगाते समय उन्हें गोलियों से छलनी कर दिया गया। उस समय अपार सिंह दुकान की ऊपरी मंजिल पर ही परिवार के साथ रहते थे। इस अनहोनी की तारीख, समय जैसे हरिंदर कौर को रटा हुआ है। भूलती भी कैसे, आखिर यही तो वह दिन था, जिस दिन उनके हंसते-खेलते घर-परिवार को बज्राघात हुआ था। वे दुर्दिन हरिंदर कौर के चेहरे पर साफ झलक रहे थे। आंखों में नमीं छिपाए नहीं छिप रही थी। बात शुरू होते ही उन्होंने पूरा घटनाक्रम चंद पलों में ही सामने रख दिया।
हरिंदर कौर बताती हैं कि उस समय उनकी आयु मात्र 28 साल की थी और बेटी साढ़े चार साल तथा बेटा साढ़े तीन साल का था। इसके बाद उनके ऊपर बच्चों को संभालने के साथ दुकान की देखरेख करने की बड़ी जिम्मेदारी आ पड़ी। कई बार हिम्मत भी हारी, जीवन बोझ लगने लगा, लेकिन दोनों मासूम बच्चों (एक बेटी, एक बेटा) की खातिर उन्होंने साहस जुटाया और बच्चों की परवरिश के साथ दुकान भी संभालनी शुरू कर दी। इंदिरा गांधी हत्याकांड के समय उनकी दुकान को आग भी लगा दी गई थी। इस आग ने उनके हौसलों के साथ बच्चों को पालने के सपने भी जलाकर खाक कर दिए।
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विधाता की इस अग्नि परीक्षा के बाद हालात कुछ सामान्य होने पर किसी तरह फिर संभाली लेकिन कुछ दिन बिाद दुकान में चोरी हो गई और कुछ समय बाद फिर दुकान में आग लग गई। जिससे वह पूरी तरह टूट गईं। तंग हालात में उसने अपने जेवर गिरवीं रखकर जैसे-तैसे 30 हजार रुपये फिर जुटाए और नए सिरे से दुकान का काम शुरू करने की हिम्मत जुटाई। साइकिल कंपनियों ने भी उन पर विश्वास करते हुए उधारी देनी शुरू कर दी और इस तरह उनके जीवन की गाड़ी एकबार फिर चल पड़ी। हरिंदर कौर बताती हैं कि इस मुसीबत की घड़ी में उनकी, बड़ी बहन जसवीर कौर, जसवीर कौर के देवर मिलन मैरिज लॉन के स्वामी सुरेंदर सिंह ने काफी मदद की। यदि उन्होंने नहीं संभाला होता तो, शायद आज वह इस स्थिति में नहीं होतीं। इतना ही नहीं हरिंदर कौर के देवर मंजीत सिंह ने दो साल तक दुकान पर बैठकर दुकानदारी के गुर भी सिखाए।
समय के साथ संघर्ष करते हुए हरिंदर कौर ने दोनों बच्चों को उच्च शिक्षा दी और दोनों का विवाह किया और आज वह छोटे-बड़े तीन शोरूम की मालकिन हैं। उन्होंने अपना घर भी बना रखा है, जहां बेटे गुरशरण सिंह रानू, बहू और पोते-पोती के साथ हंसी-खुशी जीवन बसर कर रही हैं।
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