फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

आखिर कहां चले गए आठ हजार यूपी बोर्ड परीक्षा के अभ्यर्थी

विज्ञापन
आखिर कहां चले गए आठ हजार यूपी बोर्ड परीक्षा के अभ्यर्थी - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विज्ञापन
संतकबीरनगर। यूपी बोर्ड परीक्षा में मंगलवार को दोनों पालियों में हिंदी विषय की परीक्षा थी। इस अनिवार्य विषय में अनुपस्थिति को ही परीक्षा छोड़ने वाले बच्चों की संख्या मानी जाता है। इसमें कुल 8212 अभ्यर्थी अनुपस्थित रहे। इस वर्ष नामांकन से लेकर परीक्षा फार्म भरने तक तमाम कड़े प्रावधान किए गए थे। इसके बावजूद इतनी बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों का गायब रहना बड़ा सवाल है। विभाग जहां इसकी वजह सख्ती बता रहा है तो शिक्षा जगत से जुड़े लोग नकल कराने के लिए दो-दो जगह कराए गए नामांकन बता रहे हैं।  
विज्ञापन

जिले में कुल 279 माध्यमिक विद्यालय हैं। इस वर्ष  बोर्ड परीक्षा के लिए इन कॉलेजों से कुल 58918 अभ्यर्थी पंजीकृत हैं। इनमें से 32057 अभ्यर्थी  हाईस्कूल आैर 26861 अभ्यर्थी  इंटरमीडिएट के हैं। मंगलवार की सुबह हाईस्कूल की हिंदी आैर  शाम को इंटर की हिंदी विषय की परीक्षा थी। हिंदी अनिवार्य विषय होने के कारण सभी अभ्यर्थियों के लिए परीक्षा देना अनिवार्य है। इसलिए इस विषय में अनुपस्थिति व उपस्थिति को भी वास्तविक संख्या माना जाता है। मंगलवार को हुई परीक्षा में हाईस्कूल के 4625 और इंटर के 3587 अभ्यर्थी अनुपस्थित थे। इस तरह परीक्षा छोड़ने वाले कुल अभ्यार्थियों की संख्या 8112 हो गई। परीक्षा का डर कम करने के लिए अब ग्रेडिंग हो रही है तथा बहु विकल्पीय प्रश्नों की संख्या बढ़ने से नंबर भी अधिक मिलते हैं। इसके बावजूद इतनी बड़ी संख्या में अभ्यार्थियों का अनुपस्थित रहना चिंताजनक है। विभाग का दावा है कि परीक्षा के दौरान हर कमरे में सीसीटीवी कैमरे से निगरानी व नकल पर पूरी तरह से विराम लगा देने से ऐसा हुआ है लेकिन माध्यमिक शिक्षा विभाग से जुड़े लोग ही इस पर सवाल भी उठा रहे हैं। कहा जा रहा है कि हर वर्ष परीक्षा के दौरान बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों की अनुपस्थिति आश्चर्य जनक है। बोर्ड ने छात्रों का दो-दो जगह नामांकन रोकने के लिए अब नौवीं कक्षा में ही एनरोलमेंट की व्यवस्था की है। छात्रों का नाम व आधार नंबर भी फीड किया जा रहा है। इसके बावजूद बच्चों का परीक्षा के दौरान गायब होना कहीं न कहीं सिस्टम की गड़बड़ी को इशारा करता है। कई प्रधानाचार्यों का मानना है कि नकल की गुंजाइश की आस में कई कॉलेजों में फर्जी नामांकन होता है, संभव है कि यह उसी का परिणाम हो। डीआईओएस शिव कुमार ओझा का कहना है कि तमाम ऐसे भी लोग हैं जो अपने पाल्यों का नामांकन तो करा देते हैं लेकिन मनमाफिक सेंटर नहीं मिलने पर बच्चे परीक्षा के लिए नहीं आते। यह संख्या उन्हीं छात्रों की है जो पूरे वर्ष स्कूल में नजर नहीं आते।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें