फिर... केवल कागजों में ओडीएफ बनेगा जिला
संतकबीरनगर। आगामी दो अक्तूबर को गांधी जयंती के अवसर पर संतकबीरनगर जिला को ओडीएफ घोषित करने के लिए प्रशासन एड़ीचोटी का जोर लगाए हुए है। लेकिन इस बार भी प्रशासन के दावे कितने सही दिखाई देेेते हैं यह तो सर्वे के बाद ही पता चल पाएगा। हालांकि, जिले को ओडीएफ घोषित करने की अब तक के प्रयास कागजी ही साबित हुए हैं। पिछली गणना के अनुसार जिले में 2.34 लाख शौचालय बनाने का दावा किया गया था लेकिन जांच हुई तो आंकड़ों में भारी अंतर मिला। इसके बाद 67 हजार शौचालयों के लिए बजट फिर से जारी किए गए लेकिन अब तक इनमें से करीब 45 हजार ही तैयार हो पाए हैं।
वर्ष 2012 में पहली बार देश भर में शौचालय विहीन परिवारों की गणना हुई थी। उसके अनुसार जिले में 2.34 लाख परिवारों के पास शौचालय नहीं थे। वर्ष 2014 में शुरू हुए स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत इन वंचित परिवारों के लिए शौचालय निर्माण शुरू किए गए। पिछले वर्ष दो अक्तूबर को पंचायतीराज विभाग ने वर्ष 2012 के बेस लाइन सर्वे के आधार पर वंचित 2.34 लाख परिवारों को शौचालय बनवाने का दावा किया गया। जांच के लिए 63 टीमें लगाईं गईं। उन टीमों ने हर गांव में और शौचालयों की जरूरत होने का रिपोर्ट सौंपा तो प्रशासन बंगले झांकने लगा था। इसके बाद फिर सर्वे कराया गया और 67 हजार ऐसे परिवार चिन्हित किए गए जिनके घरों में अब भी शौचालय नहीं बने थे। बीते दिसंबर माह में इन वंचित परिवारों के लिए बजट आवंटित किया गया। इनमें से भी अब तक लगभग 45 हजार परिवारों में ही शौचालय निर्माण की रिपोर्ट आई है। अभी इनकी जियो टैगिंग होनी बाकी है।
पिछले सप्ताह डीएम ने फिर से जिले के ब्लॉकों के बीडीओ से शौचालय से वंचित परिवारों की सूची मांगी है। इसके लिए 15 से 25 अगस्त तक अभियान चलाकर गिनती की जानी थी। यह सूची डीपीआरओ कार्यालय को 25 अगस्त तक सौंपनी थी। लेकिन मंगलवार 27 तारीख तक केवल पौली व मेंहदावल ब्लाक की ही सूची मिल सकी है। शेष सात ब्लाकों हैंसर, नाथनगर, खलीलाबाद, बघौली, बेलहर, सांथा और सेमरियांवा की रिपोर्ट का कोई अतापता नही है।
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जियो टैगिंग खोल रहा पोल
पंचायतीराज विभाग आंकड़ों में तो शौचालय निर्माण तेजी से कराता है। लेकिन जब इसकी जियो टैगिंग होती है तो मामला उलट जाता है। पिछले वर्ष जो 2.34 लाख शौचालय बने थे उसकी जियो टैगिंग ही दो अक्तूबर तक पूरी नहीं हो पाई। दिसंबर तक जब जियो टैगिंग का कार्य पूर्ण हुआ तो करीब 50 हजार फोटो अस्वीकृत हो गए। कारण यह कि किसी शौचालय में फाटक नहीं था तो किसी की रंगाई-पुताई नहीं कराई गई थी। बड़ी संख्या में ऐसे भी फोटो थे जिस पर नाम ही नहीं लिखा था। इस वर्ष भी बन रहे 67 हजार शौचालयों की जियो टैगिंग में 50 फीसदी काम पूरा नहीं हुआ है। इससे नाराज सीडीओ ने जून में एडीओ पंचायतों का वेतन रोक दिया था। कई ग्राम पंचायत सचिवों के खिलाफ कार्रवाई हुई लेकिन हालत नहीं सुधरे।
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जांच में भी अधूरे मिले हैं शौचालय
जिले को ओडीएफ बनाने से पूर्व अब तक जितने भी गांवों में शौचालय की जांच हुई है तो वह अधूरे मिले हैं। सबसे खराब स्थित मेंहदावल, सेमरियांवा, पौली और हैंसर ब्लाकों की है। खुद डीपीआरओ की जांच में एक दर्जन से अधिक ग्राम पंचायतें ऐसी चिन्हित की गई हैं, जहां शौचालय या तो अधूरे हैं या प्रधान सचिवों ने ही धन निकासी के बावजूद निर्माण कार्य नहीं कराया है।
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क्या कहते हैं सीडीओ
जिले को संपूर्ण रूप से स्वच्छ बनाने के लिए युद्घस्तर पर प्रयास हो रहा है। लगातार गांवों की जांच की जा रही है। भी हर दिन मॉनीटरिंग की जा रही है। दो अक्तूबर से पहले जिले को पूर्ण रूप से ओडीएफ बना लिया जाएगा। बजट दिए जाने के बाद भी शौचालय अधूरे हैं वहां नोटिस भेजी जा रही है।
डॉ. बब्बन उपाध्याय, सीडीओ
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बुधवार तक आ जाएगी रिपोर्ट
शौचालय से वंचित परिवारों की सूची 25 अगस्त तक मांगी गई थी लेकिन कुछ जगहों पर कार्य में देरी हुई है। बुधवार तक सभी नौ ब्लाकों की रिपोर्ट मिल जाएगी। पहले 2.34 लाख शौचालय बनवाकर जियो टैगिंग करा दी गई है। बाद में 67 हजार शौचालयों के लिए बजट जारी किया गया था जिसकी जियो टैगिंग कराई जा रही है। साथ ही सफाई कर्मियों की टीम लगाकर लोगों को शौचालय के प्रयोग व साफ सफाई के लिए जागरूक किया जा रहा है।
आलोक कुमार प्रियादर्शी, डीपीआरओ