सूत की महंगाई से चौपट हुआ बुनकरों का धंधा
बुनकर गमछा, चद्दर, लुंगी, दुपट्टा व सूती कपड़ों की बिनाई का करते थे काम
मेंहदावल। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने चरखा व गुंडी अर्थात कत्तिन और बुनकर को आजादी के आंदोलन से जोड़ दिया। इसे आजादी की लड़ाई का शस्त्र बना डाला, लेकिन आज यह उद्योग बंदी के कगार पर है। कपड़ों की बुनाई पावरलूम से शुरू हुई, लेकिन वर्ष के भीतर आसमान छूते सूत की कीमत ने पावरलूम व बुनकरों के भविष्य पर विराम लगा दिया।
जनपद का मेंहदावल क्षेत्र बुनकर बहुल क्षेत्र कहा जाता है। बघौली विकास खंड के नौरो, अमरडोभा, लेडुआ महुआ, बखिरा समेत कई स्थानों पर बुनकर पहले हथकरघा से कपड़ों की बुनाई करते थे। आधुनिक युग में पावरलूम चलाकर कपड़ों की बुनाई करते हैं। वही मेंहदावल विकास खंड के नंदौर, ब्रह्मचारी, बारागद्दी, केवटलिया सानी, नई बाजार, ठाकुरद्वारा, पश्चिमटोला, सांथा विकास खंड के लोहरसन, भिटिया आदि कई ऐसे स्थान हैं, जो बुनकर बहुल क्षेत्र माना जाता है। पहले यहां हथकरघा बुनकरों के जीवन यापन का मुख्य व्यवसाय था। बुनकरी से बने कपड़ों की मांग उत्तर प्रदेश के अलावा बंगाल, आसाम, महराष्ट्र, गुजरात आदि प्रांतों में भी खूब थी। खलीलाबाद का बरदहिया बाजार ने बुनकरों के तैयार कपड़ों से अपनी पहचान कायम की थी, लेकिन वर्तमान में हथकरघा उद्योग बंदी के कगार पर है। बुनकर पावरलूम से गमछा, चद्दर, लुंगी, दुपट्टा व सूती कपड़ों की बिनाई करते थे। जिनकी मांग क्षेत्र के अलावा अन्य जनपदों व प्रांतों में खूब रही। इससे बुनकरों को अच्छी आय हो जाती थी, लेकिन वर्तमान में सूत के दाम आसमान छू रहे हैं। इस कारण पावरलूम का कारोबार भी ठप पड़ गया है।
किसी सरकार ने नहीं ली सुध
हथकरघा उद्योग के विकास के लिए देश की आजादी से आज तक किसी सरकार ने धरातल पर कोई कार्य नहीं किया। आधुनिक युग में मशीनों का बोलबाला है। बुनकर पावरलूम के सहारे अपना जीवकोपार्जन चलाने की दिशा में बढे़ं, लेकिन बदहाल विद्युत व्यवस्था व आसमान छूती सूत के कीमतों ने बुनकरों के भाग्य पर ताला लगा दिया।
- बदरे आलम बुनकर
नहीं मिलती बिजली पर सब्सिडी
केंद्र सरकार ने अनुसूचित जाति के बुनकरों को स्वरोजगार देने के उद्देश्य से छठे बजट में झलपकारी बाई कोरी हथकरघा एवं पावरलूम स्पेशल कंपोनेट योजना चलाने की घोषणा की। पावरलूम बुनकरों को रियायती दर पर बिजली देने का प्रावधान बनाया, लेकिन ढाई वर्ष से यहां के बुनकरों को विद्युत निगम की सब्सिडी नहीं मिली। आज यहां का बुनकर विद्युत निगम का कर्जदार बना हुआ है।
- अशरफ अली बुनकर
लगातार बढ़ रहे सूत के दाम
सूत के दाम एक वर्ष में दोगुने हो गए। एक वर्ष पूर्व 24 नंबर सूत की कीमत बाजार में 800 रुपये थी। आज इसकी कीमत 1580 रुपये है। 40 नंबर सूत की कीमत वर्ष 2020-21 में एक हजार रुपये थी, वहीं वर्ष 2021-22 में इसकी कीमत 1980 रुपये है। 14 नंबर सूत की कीमत एक वर्ष पूर्व 560 रुपये थी, वर्तमान में इसकी कीमत 980 रुपये है। इसी तरह 60,30,32 नंबर सूत के दाम भी आसमान छू रहे हैं। जिसके कारण पावरलूम के व्यवसाय बंदी के मुहाने पर खडे़ हैं।
कय्यूम बुनकर
सरकार की योजनाओं का नहीं मिला लाभ
हथकरघा के विकास के लिए तत्कालीन सरकारों ने गंभीरता नहीं दिखाई। पावरलूम के माध्यम से बुनकर कपड़ों की बिनाई करने लगे। वर्तमान में बदहाल विद्युत व्यवस्था व बाजार में बढ़ते सूत के दाम भी इस व्यवसाय को भी बंदी के कगार पर ला दिए हैं। कई लोग अब यहां से पलायन कर महाराष्ट्र के भिमंडी में रोजी-रोटी का जुगाड़ कर रहे हैं। बुनकरों की दयनीय स्थिति को सुधारने के लिए भले ही सरकार तमाम योजनाएं चलाने की दावा कर रही हो, लेकिन बुनकरों तक सरकार की योजनाएं आज तक नहीं पहुंची।
अकबर अली बुनकर