सिसवा बाजार। क्षेत्र के एक गांव में बृहस्पतिवार को सूरज निकलने से पूर्व ही खाली हो गया। न किसी के घर में चूल्हे जले न ही गांव में किसी ने भोजन किया। समूह में सभी ने घर छोड़ा तो कोई चिंता नहीं थी। लोगों ने गांव के बाहर बगीचे में दिनभर के लिए आशियाना बनाया।
अमीरी-गरीबी का बंधन तोड़ लोग अपने-अपने सुविधा के अनुसार गांव के बगीचों में सूर्यास्त तक के लिए शरण लिए। इस दौरान महिलाएं समूह में मंगलगान गा रही थीं, तो कुछ महिलाएं अच्छे पकवान बनाने में जुटी थीं। बच्चे अपने ही मस्ती में थे। बुजुर्ग अपने पुराने दिन और नए जमाने के रहन सहन पर चर्चा में व्यस्त थे।
बेलवा चौधरी गांव निवासी नागेंद्र मल्ल का कहना है कि गांव में कई दशकों से चली आ रही परावन एक अनूठी परंपरा है। पूर्वजों का कहना था कि गांव में महामारी आने के कारण इस परंपरा की नींव पड़ी थीं। आज भी गांव के लोग उस परंपरा का निर्वहन पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ करते आ रहे हैं। इसे हर तीसरे वर्ष बुद्ध पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है और इष्टदेव की पूजा अर्चना कर गांव के सलामती की दुआ की जाती है। परावन के चलते लोगों के घर छोड़ने से गांव दिन भर सूना रहता है। खास बात यह है कि परंपरा को मनाने में सभी धर्म और जाति के लोग शामिल होते हैं। सूर्योदय के पूर्व खाली हुआ गांव सूर्यास्त के बाद आबाद हो जाता है। तकरीबन 12 घंटे गांव पूरी तरह से सूना पड़ा रहता है। परावन के अवसर पर गांव का पानी तक नहीं छूआ जाता है। घर छोड़ने से पहले ग्रामीण अपने-अपने घरों के हैंडपंप का हेड को खोल कर रख देते हैं। बर्तन धोने, भोजन बनाने और नहाने के लिए दूसरे गांव से पानी लाया जाता है। दिनभर के पूजा अर्चना के बाद सूर्यास्त होते ही सभी लोग हंसी खुशी के साथ अपने अपने घरों को लौट जाते हैं।