आंकडों में खेल, ओडीएफ की घोषणा में फंसा पेच
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संतकबीरनगर। कागजी आंकड़े दुरूस्त कर जिले को ओडीएफ घोषित कराने की प्रशासनिक हड़बड़ी ही अफसरों के लिए मुसीबत बन गई है। पंचायतीराज विभाग ने एमआईएस डाटा फीड करते हुए सभी सूचीबद्घ लोगों के शौचालय निर्माण की सूचना दे दी। इसी आधार पर सभी 794 ग्राम पंचायतों को ओडीएफ घोषित करने का प्रस्ताव भी दे दिया गया। जब इनका भौतिक सत्यापन शुरू हुआ तो तमाम गांवों में अब भी लक्ष्य अपूर्ण है। अब जल्दी-जल्दी आंकड़े दुरूस्त किए जा रहे हैं।
वर्ष-2012 में जिले के सभी 794 ग्राम पंचायतों के 1605 राजस्व गांवों में शौचालय निर्माण की जानकारी के लिए शासन ने बेस लाइन सर्वे कराया था। सर्वे रिपोर्ट के अनुसार उस वक्त जिले के तीन लाख 33 हजार परिवारों में से 99 हजार परिवारों में शौचालय था। शेष बचे 2.34 लाख परिवारों में स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण के तहत शौचालय बनाना था। इस सूचीबद्ध सर्वे रिपोर्ट के आधार पर ही वर्ष 2014 से वृहद स्तर पर शौचालय निर्माण का अभियान शुरू हुआ। शुरूआत में शौचालय निर्माण के लिए मिलने वाली 12 हजार रुपये की धनराशि संख्या के आधार पर सीधे ग्राम पंचायतों को भेज दी गई। इस साल सरकार ने दो अक्तूबर को जिले को ओडीएफ घोषित करने का लक्ष्य तय किया। कार्य जल्दी पूरा दिखाने की हड़बड़ी में ग्राम पंचायतों के अलावा व्यक्तिगत स्तर पर भी लाभार्थियों के खाते में रुपये भेज दिए गए, जितने रुपये भेजे गए उसके हिसाब से शौचालय निर्माण शुरू मानकर डीपीआरओ कार्यालय ने अपनी प्रगति रिपोर्ट तैयार कर ली, लेकिन शासन ने प्रगति रिपोर्ट की पुष्टि के लिए जब इसकी जियो टैगिंग (संपन्न हुए कार्य केा फोटो) का आंकड़ा मांगा तो हालत बिगड़ गई। अक्तूबर महीने में एमआईसी डॉटा में जहां शति प्रतिशत निर्माण दिखाया जा रहा था, वहीं जियो टैगिंग में आंकड़ा 70 प्रतिशत तक ही पहुंचा। पिछले सप्ताह कलेक्ट्रेट में जब मंडलायुक्त की अध्यक्षता में इसकी समीक्षा बैठक हुई तो उसमें पंचायतीराज विभाग ने जो आंकड़े प्रस्तुत किए उसे देखते ही कमिश्नर नाराज हो गए। कमिश्नर ने जियो टैगिंग में भी करीब 44 हजार फोटो नाट अप्रूव्ड होने पर नाराजगी जताई। नाट अप्रूव्ड फोटो की यह संख्या उन लाभार्थियों की थी जिनके घर शौचालय निर्माण की संबंधित फोटो पर अफसरों को भी संदेह था और सत्यापन के बाद इसकी पुष्टि कराई जानी थी।