संतकबीरनगर। खलीलाबाद शहर के लक्ष्मी नारायण मंदिर के पास चल रही श्रीमद्भागवत कथा में शुक्रवार को श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह की लीला हुई। इस दौरान बड़े ही धूमधाम से गोला बाजार से श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह की बरात निकली, जिसमें बैंड बजा और बराती कुसुम देवी, नंदलाल कसौधन, सुप्रिया गुप्ता, दिव्य रत्ना गुप्ता, सन्नो गुप्ता, पार्वती गुप्ता, दुर्गा कसौधन्र, सलोनी गुप्ता, बनर्जी लाल अग्रहरि, कपीश अग्रहरि, सत्यप्रकाश गुप्ता सिपाही, कन्हैया वर्मा, संतोष कसौधन, मनोज गुप्ता, विनोद कसौधन, विवेकानंद वर्मा, सतविंदर पाल उर्फ जज्जी आदि लोग शामिल होकर कथा स्थल पहुंचे।
इस दौरान सभी बरातियों का स्वागत किया गया। व्यास पीठ अतुल कृष्ण शास्त्री ने रुक्मिणी विवाह महोत्सव प्रसंग पर व्याख्यान करते हुए कहा कि भगवान द्वारकाधीश ने रुक्मिणी के सत्य संकल्प को पूर्ण किया। रुक्मिणी विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री थी। भीष्मक मगध के राजा जरासंध के जागीरदार थे। रुक्मिणी का ज्येष्ठ भ्राता रुक्मी दुष्ट राजा कंस का मित्र था, जिसका कृष्ण द्वारा वध कर दिया गया था। इस कारण वह इस विवाह के विरुद्ध था। रुक्मिणी के माता-पिता रुक्मिणी का विवाह कृष्ण से ही करना चाहते थे, लेकिन रुक्मी ने इसका कड़ा विरोध किया। रुक्मी एक महत्वाकांक्षी राजकुमार था और वह निर्दयी जरासंध का क्रोध नहीं चाहता था, इसलिए उसने प्रस्तावित किया कि उनका विवाह शिशुपाल से किया जाए, जो कि चेदिदेश का राजकुमार व श्रीकृष्ण का फुफेरा भाई था। शिशुपाल जरासंध का एक जागीरदार और निकट सहयोगी भी था, इसलिए वह रुक्मी का भी सहयोगी था। भीष्मक अपनी आत्म इच्छा को मारकर रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल के संग करने के लिए स्वीकृति दे दी, लेकिन रुक्मिणी जो कि इस वार्तालाप को चुपके से सुन चुकी थी। उसने शीघ्र ही एक विश्वस्त ब्राह्मण को कृष्ण को संदेश देने के लिए मना लिया, जिसमें कृष्ण को विदर्भ आकर उन्हें अपने साथ ले चलने की विनती की। श्रीकृष्ण ने युद्ध से बचने के लिए उनका हरण कर लिया। द्वारिका में श्री कृष्ण रुक्मिणी का विवाह सम्पन्न हुआ।