संवाद न्यूज एजेंसी
हरिहरपुर। नाथनगर इलाके के जांबाज सपूत ने करीब 22 साल पहले कश्मीर के पुलवामा में वीरता की जो शौर्यगाथा लिखी थी, उसकी चर्चा आज भी क्षेत्र के लोगों की जुबां पर है।
बलिदानी रामप्रीत चौरसिया ने घायल होने के बावजूद तीन दहशतगर्दों को मुठभेड़ के दौरान मौत की नींद सुला दी थी। आतंकियों की गोली लगने से जख्मी रामप्रीत चौरसिया सेना के अस्पताल में इलाज के दौरान बलिदान हो गए थे।
ब्लॉक के अलीनगर गांव निवासी रामप्रीत चौरसिया वर्ष 1988 में बीएसएफ में कांस्टेबल भर्ती हुए। साल 2001 में उन्हें कश्मीर के पुलवामा में तैनात 52वीं बटालियन में सेवा का मौका मिला। सितंबर 2003 में सुरक्षा एजेंसियों को पुलवामा के नरवानी सेक्टर के एक रिहायशी मकान में दहशतगर्दों के छिपे होने का इनपुट मिला।
खुफिया जानकारी मिलने के बाद ऑपरेशन की जिम्मेदारी बीएसएफ 52वीं बटालियन को सौंपी गई, जिसमें रामप्रीत की तैनाती थी। रामप्रीत बटालियन के साथियों के साथ मौके पर पहुंचकर आतंकियों के ठिकाने को चारों ओर से घेर लिए। खुद को फंसा देख दहशतगर्दों ने सेना के जवानों पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी।
इस शुरुआती हमले में बटालियन के एक एएसआई और एक कांस्टेबल गोली लगने से गंभीर रूप से घायल हो गए। साथियों के घायल होने के बाद रामप्रीत चौरसिया ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए आतंकियों को जवाब देने के लिए अकेले ही मोर्चा संभाल लिया। काफी देर तक दोनों ओर से चली गोलीबारी में रामप्रीत ने घर में छिपे तीनों दहशतगर्दों को मौत के घाट उतार दिया।
इस दौरान वे खुद भी गोलियां लगने से जख्मी हो गए और सेना के अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली।