श्रावण शुक्ल पक्ष की पंचमी अर्थात नागपंचमी जिले भर में परंपरा, श्रद्धा और विश्वास के साथ रविवार को मनाई गई। दूध, दही और शहद से मंदिरों में भगवान शिव का अभिषेक किया और नाग देवता को दूध-लावा चढ़ाया गया। जगह-जगह कुश्ती, कबड्डी का आयोजन किया गया। इस दौरान महिलाओं ने झूला झूला पारंपरिक कजरी गीत भी गाया। इसके अलावा घरों में विभिन्न प्रकार के पकवान बनाए गए।
पंडित वाचस्पति द्विवेदी ने बताया कि सृष्टि के सभी प्राणी महत्वपूर्ण है, यहां तक साक्षात काल कहलाने वाले नाग भी हमारे मित्र हैं। इसलिए भारतीय समाज में नाग पूजन की परंपरा सदियों से चली आ रही है। श्रावण शुक्ल पंचमी को पारंपरिक रूप से नाग देवता की पूजा होती है।
रविवार को स्नान ध्यान के बाद महिलाओं ने मंदिरों में जाकर नाग देवता की पूजा की। मान्यता के अनुसार नाग देवता से घर में होने वाले किसी तरह के अशुभ प्रभाव से मुक्ति और परिवार के सुख समृद्धि की प्राप्ति के लिए प्रार्थना पूजा की जाती है। राहु, केतु अथवा काल सर्प योग से शांति के लिए कुछ परिवारों ने चांदी के नाग नागिन को बहते जल में प्रभावित किया।नागपंचमी पर सिद्धि योग, सर्वार्थ सिद्धि और अमृत सिद्धि योग के विद्यमान रहने से इस पर्व का महत्व और बढ़ गया। इस कारण लोगों ने काल सर्प योग शांति के लिए अनुष्ठान भी कराया।
खलीलाबाद शहर के लक्ष्मी नारायण मंदिर, स्टेशन पुरवा स्थित शिव मंदिर, समय जी मंदिर, गन्ना विकास संस्थान के बगल में स्थित शिव मंदिर के अलावा अन्य शिव मंदिरों में दर्शन पूजन किया। सायंकाल गांव के बाहर पोखरों पर दरिद्रता के प्रतीक रूप में गुड़िया पीटने की रस्म अदा की गई। बेलहर कलां के भितरी टोला में स्थित शिव मंदिर, सेहूआ नाथ शिव मंदिर, लोहरौली मिश्र ,सेमरियावां, हैंसर, बघौली, नाथनगर, मेंहदावल, हरिहरपुर सहित अन्य ग्रामीण क्षेत्रों में भी नागपंचमी के अवसर पर मंदिरों में लोगों की भीड़ लगी रही।
वहीं बखिरा भंगेश्वरनाथ, सहदेवनाथ, ठाकुरद्वारा, कोपिया के कोपेश्वरनाथ में श्रद्धालु महिला, पुरुष व बच्चे भोर से ही लाइन में लगकर अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे। दूध, लावा, चना चढ़ाकर लोग मनौतियां मांग रहे थे। कस्बे के सहदेवनाथ मंदिर के प्रांगण में प्रतिवर्ष की भांति शाम को मेला लगा।